कांग्रेस

दिल्ली। इसी साल आए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जिस तरह मुंह की खानी पड़ी है, ऐसे में यह तो साफ हो गया है कि कांग्रेस (Congress Party) की मुश्किलें हर दिन बढ़ती जा रही हैं।


पार्टी में गांधी परिवार पहले से ही अपनों के निशाने पर है, वहीं पांच राज्यों में मिली चुनावी हार के बाद अब बेहद करीबी भी पार्टी का दामन छोड़ सकते हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं दिल्ली में होने वाले आगामी चुनाव में पार्टी अपना अस्तित्व पूरी तरह से खो सकती है। दिल्ली में हुए बीते तीन बार के चुनावों में कांग्रेस हार के ही दरवाजे पर अटकी हुई है। तीनों बार सरकार अपना खाता तक खोलने में नाकाम रही है। इन हालातों में दिल्ली में अपने वर्चस्व को बचाए रखना पार्टी के लिए हर दिन मुश्किल होता जा रहा है।

वहीं बात अगर राष्ट्रीय स्तर पर करें तो पार्टी के कट्टर समर्थक भी अब पार्टी के भविष्य को लेकर हताश नजर आने लगे हैं। पांच राज्यों में मिली करारी हार के बाद हुए मंथन में पार्टी ने आगामी चुनाव को लेकर रणनीति तो तैयार कर ली है, लेकिन ये कह पाना कठिन होगा कि पार्टी साल 2022 में होने वाले पांच राज्यों के चुनाव के चक्रव्यूह को भेद पायेगी। हालांकि इस चक्रव्यूह की कमान इस बार प्रियंका गांधी वाड्रा ने संभाल ली है। बता दे प्रियंका को आयरन लेड़ी इंदिरा गांधी की छवि के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में आगामी चुनावों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि कांग्रेस की डूबती नैइया…को प्रियंका पार लगा पाती है या नहीं।

कांग्रेस में करो या मरो की स्थिति


उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों(UP Election 2022) में कांग्रेस(Indian National Congress) को जीत दिलाने के लिए पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा (Priyanka Gandhi) ने अपनी पुरजोर कोशिशें शुरू कर दी है। प्रियंका गांधी वाड्रा कांग्रेस की सत्ता में वापसी को लेकर दावे भी कर रही है। प्रियंका गांधी का कहना है कि अगले 7 महीने प्रदेश कांग्रेस के शानदार भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक होने वाले हैं।

बता दे हाल ही में प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में अपने तीन दिवसीय दौरे का समाप्न कर कांग्रेस के पदाधिकारियों, पूर्व सांसदों और विधायकों सहित संगठन के कई उच्च पदाधिकारियों से मुलाकात करने पहुंची थी। इस दौरान उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया था कि- प्रदेश में आगामी चुनाव को लेकर सभी महत्वपूर्ण फैसलों में सांगठनिक महत्व हर हाल में अनिवार्य है। प्रियंका गांधी वाड्रा का रुख देखते हुए यह साफ लग रहा है कि प्रियंका सत्ता में कांग्रेस की वापसी के लिए अपनी जी-जान लगा देंगी। हालांकि उनकी यह पुरजोर कोशिश किस हद तक कामयाब होगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

बकौल प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) आगामी 7 महीने कांग्रेस के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक होने वाले हैं। यह सब कांग्रेस के राजनीतिक स्वाभिमान और सम्मान दोनों के लिए बेहद जरूरी है। ऐसे में कांग्रेसजनों को खुद ही अपने स्वाभिमान और सम्मान के लिए अपनी कमर कसनी होगी और लोगों के बीच एक बार फिर से अपनी पहचान खड़ी करनी होगी।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का कहना है कि जन आंदोलन की पहचान के साथ ही संगठन को सरकार की जनविरोधी नीतियों का मुखर विरोध भी करना होगा। ऐसे में कांग्रेस की छवि सुधारने में प्रियंका गांधी की यह रणनीति किस हद तक कामयाब होती है यह आगामी चुनाव के दौरान ही तय होगा।

सवालों के घेरे में कांग्रेस के अपने

मौजूदा समय में पार्टी का नेतृत्व कर रहे चेहरे को लेकर पार्टी में आपसी दरार जारी है। ऐसे में भारतीय राजनीति की यह विडंबना भी है कि लंबे समय से पार्टी में काम करने वाले चेहरे ही अब पार्टी पर सवाल उठाने लगे हैं। हालांकि उनके इस सवाल को गलत ठहराना भी गलत होगा। भारतीय राजनीति की यह त्रासदी है कि यह पारिवारिक सत्ता लोभी ही रही है। ऐसे में जब तत्कालीन नेतृत्व को लेकर ही पार्टी के मुखर चेहरे विरोध करने लगे हैं तो उन्हें विरोधी पार्टियों के इशारे पर काम करने वाला या पार्टी के लिए विश्वासघाती करार दिया जाने लगता है। हालांकि पार्टी के मुखर चेहरे पर सवाल उठाने का उनका एकमात्र उद्देश्य पार्टी की बिखर रही छवि को समेटने की ओर ध्यान देने का होता है।

गौरतलब है कि कांग्रेस में मौजूदा समय में कई ऐसे कट्टर कांग्रेसी हैं, जो कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व चेहरे के विरोधी हैं। बात गुलाम नबी आजाद की हो या पार्टी का दामन छोड़ चुके आदित्य राजे सिंधिया की…जहां एक और गुलाम नबी आजाद को लेकर पार्टी के आलाधिकारियों का कहना है कि यह बीजेपी की जुबान बोलते हैं, तो वही पार्टी का दामन छोड़ चुके सिंधिया को घर का भेदी लंका ढहाये जेसी कहावतें का चरितार्थ चेहरा माना जाता है।

कांग्रेस की छवि के कायदे से बात करें तो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव संगठन में बदलाव से लेकर स्थाई अध्यक्ष आदि की मांग को लेकर कई बार सार्वजनिक तौर पर चर्चा की है। जहां एक ओर कांग्रेस को पार्टी के आलाधिकारियों की इस मांग को सकारात्मक दृष्टिकोण से लेना चाहिए, तो वही पार्टी की ‘मुखर’ इसे पारिवारिक रणनीति के तौर पर तैयार करने में इस कदर जुटी हुई है कि पार्टी लगातार अपना अस्तित्व खो रही है लेकिन उनका पारिवारिक सत्ता मोह कायम है।

मालूम हो कि कार्यकारी अध्यक्ष का यह दायित्व है कि लगातार उठ रहे सवालों की स्थिति में जब पार्टी के कई बड़े नेता पार्टी के मुखर चेहरे में बदलाव की मांग कर रहे हैं तो वह इस मामले पर कार्यसमिति की बैठक बुलाये या फिर संगठन चुनाव महाधिवेशन आदि की तिथि तय करें और इस पर चर्चा करें, लेकिन पारिवारिक गद्दी सत्ता मोह ने कांग्रेस की छवि को लगातार धुंधला कर दिया है। ऐसे में यह बेहद विचारणीय है कि इतने वरिष्ठ नेताओं को सोशल मीडिया के माध्यम से या फिर अन्य मंचों से इस मुद्दे पर अपनी राय रखनी पड़ रही है। कोई दबी जुबान में इस बात को पार्टी की कमी बता रहा है तो कोई पार्टी का दामन छोड़ पार्टी पर सवाल उठा रहा है।

यूपी में कांग्रेस का अस्तित्व

3 अगस्त 1984 में आखिरी बार कांग्रेस नारायण दत्त तिवारी के तौर पर यूपी की सत्ता में काबिज हुई थी। इस दौरान नारायण दत्त तिवारी ने बतौर यूपी मुख्यमंत्री 1 साल 163 दिन का कार्यभार संभाला था। हालांकि यह बात अलग है कि आठवीं विधानसभा और नवी विधानसभा दोनों के समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस यूपी की सत्ता पर कई चेहरों के साथ काबिज रही थी, लेकिन यह आखरी बार था जब यूपी में कांग्रेस का कोई चेहरा काबिज था। 1988 के बाद कांग्रेस ने यूपी में अपना अस्तित्व पूरी तरह से खो दिया है। तब से लेकर अब तक कांग्रेस यूपी में वापसी नहीं कर पाई है। ऐसे में आगामी यूपी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए उसके बिखरे अस्तित्व को समेटने की बड़ी आस है।

दिल्ली में लगातार तीन बार रही काबिज

एक दौर में राजधानी में कांग्रेस ने साल 1998 से लेकर साल 2013 तक पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार चलाई। इस दौरान मुख्यमंत्री के पद पर विराज रही शीला दीक्षित(Sheela Dixit) की अगुवाई में पार्टी ने विकास कार्य भी किए। इसके अलावा साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने नई दिल्ली में जबरदस्त परफॉर्मेंस दी और फिर से वापसी की, लेकिन इसके बा से दिल्ली में कांग्रेस की जमीन खिसकने लगी और आज तक वह खिसकती ही जा रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति 0 पर अटक गई है। दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर कांग्रेस के हाथ बीते तीन बार से जस के तस खाली है। इतना ही नहीं तीनों नगर निगमों में पार्टी तीसरे नंबर पर चली गई है।

दिल्ली में पार्टी की हार पर मंथन

दिल्ली में लगातार तीन बार सत्ता में रहने वाली कांग्रेस का वोट प्रतिशत 3 चुनावों से गिर रहा है। साल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 24.55 फ़ीसदी, 2015 में यह वोट प्रतिशत गिरकर 9.7 फ़ीसदी इसके बाद साल 2020 में हुए चुनावों में यह और ज्यादा गिरकर 4.5 फ़ीसदी तक रह गया है।

बीते तीन चुनावों में पार्टी ने भले ही अपना अस्तित्व 0 पर सैट कर दिया हो, लेकिन पार्टी के दिग्गजों का मानना है कि पार्टी एक बार फिर वापसी करेगी। पार्टी अपना खोया हुआ जनाधार दिल्ली में वापस हासिल करेगी। दिल्ली में पड़ा सूखा कांग्रेस के लिए एक बार फिर हरा-भरा होगा। ऐसे में पार्टी के किए ये सभी दावे आगामी चुनाव में धर्मसंकट साबित होते हैं या एक रात में देखे गए सपने की पूर्ति की तरह सटीक साबित होते हैं…यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

देश और देश की राजधानी दिल्ली में लगातार हार का मुंह देख रही कांग्रेस के सामने इस समय बड़ा धर्म संकट यह है कि वह राहुल का नेतृत्व करें या पार्टी का भविष्य बचाएं। इन दो नावों में खड़ी कांग्रेस मझधार में अटकी हुई है। इसी मझधार के चलते देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी अब टूट की ओर बढ़ चली है। कांग्रेस के अहम चेहरे ही उसका दामन छोड़ रहे है। ऐसे में दिल्ली में अपने वर्चस्व को बचाना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है।

परिवारवाद के मोह से बिखरी पार्टी !

कांग्रेस के मौजूदा हालातों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस की अग्रिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को या तो बेटे का मुंह छोड़ना होगा या पार्टी की वापसी का सपना तोड़ना होगा। वही कांग्रेस में प्रियंका गांधी की सक्रियता पार्टी को कुछ हद तक राजनीति के समुद्री गलियारे में आगे तो खींच रही है, लेकिन वापसी कराने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

वहीं इस बात पर गौर करना भी बेहद जरूरी है कि कांग्रेस भले ही मौजूदा समय में राजनीति के राष्ट्रीय स्तर पर फिसड्डी साबित हुई हो, लेकिन वह देश की सत्ता की दौड़ में आज भी दूसरे नंबर पर है। ऐसे में पीएम मोदी और शाह की जोड़ी भी यह अच्छी तरह से जानती हैं कि राजनीति के अखाड़े में कांग्रेस को वह हल्के में नहीं ले सकते। शायद यही वजह है कि जिन राज्यों (बंगाल) में कांग्रेस का कोई दम नहीं है या जहां (केरल, तमिलनाडु) बीजेपी का कोई वजूद नहीं है…पार्टी के पार्टी के कमानधारी वहां भी वे कांग्रेस और गांधी परिवार पर सीधा हमला करते हैं। ऐसे में कांग्रेस की वापसी की राह भले ही कठिन हो सकती है पर नामुमकिन कुछ नहीं… वहीं फैसले और फासले तय करने का हुनर पार्टी को खुद ही दिखाना होगा और जनता हित में काम कर खुद को साबित करना होगा।

लेखक: कविता तिवारी

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