केंद्र के विरुद्ध आंदोलनों में अब तक सात सौ करोड़ की संपत्ति स्वाहा, 21 साल का अग्निवीर हाथ में बंदूक लेकर करेगा क्या ?

केंद्र के विरुद्ध आंदोलनों में अब तक सात सौ करोड़ की संपत्ति स्वाहा, 21 साल का अग्निवीर हाथ में बंदूक लेकर करेगा क्या ?

केंद्र के विरुद्ध आंदोलनों में अब तक सात सौ करोड़ की संपत्ति स्वाहा, 21 साल का अग्निवीर हाथ में बंदूक लेकर करेगा क्या ?

पता नहीं क्यों, पिछले साढ़े आठ सालों से केन्द्र सरकार की योजनाएं देश में चर्चा विवाद और असंतोष, उपद्रव का कारण बन रही है, फिर चाहे वह नोटबंदी हो, तलाकबंदी हो, धारा 370 की समाप्ति हो या कि मौजूदा अग्निपथ योजना हो, हर योजना ने देश में विवाद की छाप छोड़ी। ऐसा कतई नहीं है कि केन्द्र सरकार अब ही जनहितैषी योजनाएं प्रस्तुत कर रही है, इससे पहले भी केन्द्र सरकारों की भी योजनाएं सामने आई, असंतोष भी प्रकट किए गए, किंतु मौजूदा वक्त जैसे हिंसक आंदोलन व अग्निकांड़ों तक स्थिति नहीं पहुंची या पहुंची भी तो देश की सात सौ अरब डालर जैसी क्षति कभी नहीं उठानी पड़ी |

हाल ही में जारी एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में सामने आया कि सीएए, किसान, नुपुर विवाद तथा अग्निपथ हिंसा व उपद्रव से देश को 646 अरब डालर की क्षति उठाना पड़ी।

केन्द्र सरकार ने एक सप्ताह पूर्व ही इस अग्निपथ योजना का ऐलान किया, सबसे पहले तो किसी को भी यह समझ में नहीं आया कि देश की सुरक्षा से जुड़ी इस योजना का नामकरण ‘अग्नि’ के साथ क्यों जोड़ा गया |

क्या सेना में भर्ती आज ‘अग्निपथ’ बन गई है, फिर केन्द्र सरकार ने शायद जल्दबाजी में योजना पर बिना पूर्ण विचार विमर्श के इसे जारी कर दिया और अब जब यह योजना आंदोलन, संघर्ष, हिंसा और असंतोष के दायरें में आ गई और पूरे देश में राष्ट्रीय सम्पत्ति अग्नि को भेंट चढ़ने लगी तब सरकार इस योजना में नए नए ‘आकर्षण’ जोड़ने का प्रयास कर रही है, जैसे भर्ती किए जाने वाले अग्निवीरों को बरसों से नौकरी कर रहे सैनिकों के समान ही अवकाश, वेतन भत्ते आदि की सुविधाएं मिलेगी। क्या ये सब योजना की घोषणा के समय स्पष्ट नहीं किया जा सकता था ?

फिर इस योजना की सबसे बड़ी विसंगति यह कि देश के युवकों को ‘अग्निवीर’ के रूप में सिर्फ चार वर्षों के लिए नौकरी दी जाएगी और चार साल बाद कुल अग्निवीरों में से सिर्फ पच्चीस प्रतिशत को नियमित नौकरियों पर रखा जाएगा, बाकी पचहत्तर प्रतिशत अग्निवीर बेरोजगार हो जाएगें।

अब यहां सवाल यह पैदा होता है कि अग्निवीरों की भर्ती के लिए निर्धारित उम्र 17 से 23 वर्ष रखी गई, मान लीजिये यदि 17 वर्ष का युवक या मान लो 21 का जवान अग्निवीर बनता है तो वह 21या 27 वर्ष की उम्र में सेना से रिटायर हो जाएगा, उसके बाद वह क्या करेगा? सरकार कहती है, उन्हेें राज्य सरकार की पुलिस, होमगार्ड या अन्य सुरक्षा सेवा में वरियता देकर रखा जाएगा, तो क्या किसी भी राज्य की पुलिस या अन्य अर्थसैनिक बल में इतने पद है, जिनमें इन अग्निवीरों की भर्ती कर उन्हें रोजगार दिया जा सके?

इसका सीधा मतलब यही हुआ कि अग्निवीरों को चार साल की सेना की नौकरी के बाद शेष जीवन यापन के लिए दरदर भटकने को मजबूर होना पड़ेगा? इन्हीं सब केन्द्रीय योजनाओं की महान असफलताओं के कारण आज भारत ग्लोबल पीस इण्डेक्स में 163 देशों की सूची में 135वें स्थान पर खड़ा होने को मजबूर है और हमारे जीडीपी का 6 फीसदी हिस्सा हिंसा की आग में जलकर खाक हो गया।

मोदी सरकार ने यह आधी अधुरी योजना शायद देश के युवा वोट को अपने पक्ष में करने के लिए प्रस्तुत की थी, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी ही है, रोजगार का लालख देकर प्र्रस्तुत की गई इस योजना के बारे में सरकार ने शायद जल्दबाजी में इसके उन पहलुओं पर गौर ही नहीं किया, जिनको लेकर आज देश में बवाल मचा है?

यदि इस योजना के प्रगटीकरण के समय ही इसमें आशंकित बिन्दुओं के हल भी प्रस्तुत कर दिए जाते, जो कि अब प्रस्तुत किए जा रहे है तो देश को सात सौ अरब डालर की क्षति तो नहीं उठाना पड़ती? जितने नीतिगत सुधार इस योजना में जरूरी थे, उन पर भी केन्द्र के विद्वान राजनेताओं ने ध्यान नहीं दिया, फिर सरकार ने 2019 से 2021 की अवधि में चयनित सैनिकों के साथ हो रहे कथित अन्याय पर भी ध्यान नहीं दिया, जो आज देश की युवा पीढ़ी को गलत संदेश दे रहे है ?

इस तरह कुल मिलाकर सरकार ने इस अग्निपथ योजना को ‘आग का दरिया’ बना दिया है और अब अग्निवीरों से कहा जा रहा है कि ‘इसमें डूब के जाना है’।

साथ ही सबसे बड़ी और अहम् बात यह है कि सरकार ने चूंकि इस विवादित योजना को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है, इसलिए वह किसान योजना की तरह इसे वापस लेने को भी तैयार नहीं है और दिन प्रतिदिन इसमें राजनीति प्रवेश करती जा रही है, जो इस योजना को भी वहीं पहुंचा देगी जहां पुरानी योजनाएं शोभायमान हो रही है।

फिर सबसे बड़ी चिंता की बात यह कि प्रधानमंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक किसी को भी इस योजना के साथ जुड़े देश के भविष्य की कोई चिंता नहीं है।

लेखक: डॉ. प्रदीप चतुर्वेदी


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