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तो यह है कांग्रेस से “आजाद” होने की कहानी

तो यह है कांग्रेस से “आजाद” होने की कहानी

रिपोर्ट: सत्य पारीक, जयपुर

दिल्ली। देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता और करीब आधी शताब्दी से अधिक समय से उसके हर उतार चढ़ाव का साक्षी रहे गुलाम नबी अब उससे आज़ाद हो गए। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक के कांग्रेसी राजनीति के सफर में 51 साल की लंबी दूरी को सिर्फ पांच पन्नों में सिमटा कर अपने जिस राजनीतिक दस्तावेज को सार्वजनिक किया है, वह निसंदेह समय के साथ बदलती कांग्रेस के शाब्दिक चरित्र चित्रण को बयां करने के लिए काफी है।

गुलाम नबी आजाद कांग्रेस की दूसरी पीढ़ी के उन नेताओं में शुमार थे, जो इसके नींव के पत्थर जैसे मजबूत ही नहीं, बहुत पहले से उन कदमों की आहट को भांप लेते थे और पार्टी की जिंदगी को दूर से पहचानने वाले नेताओं में से एक थे।

क्षेत्रीय क्षत्रपों के नेताओं में वे जम्मू कश्मीर में कांग्रेस का जाना पहचाना, सबसे पुराना और बड़ा चेहरा थे जो विचार और व्यवहार में सहजता, सरलता और तरलता से कुंहरे की चादर ओढ़कर गरमाहट में भी शीतलता का अहसास कराते हुए राजनीतिक हलकों में ही नहीं, पार्टी को भी कश्मीर, कश्मीरियत और जम्हूरियत से जोड़े हुए थी।

आज अचानक ऐसा क्या हो गया गुलाम नबी आजाद को कि जाते जाते उन्होंने न केवल कांग्रेस का कच्चा चिट्ठा खोलकर, बल्कि बदलती कांग्रेस के उन वायदों और इरादों को भी झंकझोर कर रख दिया, जिसके बलबूते वह 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में व्यस्त हो रही थी। 2013 का जयपुर घोषणापत्र और बिड़ला सभागार में चिंतन शिविर के साथ महासमिति की बैठक में राहुल गांधी के राजनीतिक सफर की ताजपोशी को एक दशक भी नहीं हुआ कि गुलाम नबी आजाद ने जाते जाते उसका पलीता लगाकर चले गए। अपने पांच पन्नों के विदाई खत में उन्होंने राहुल गांधी की राजनीतिक समझ और क्षमता पर सवालिया निशान तो लगाया ही, सोनिया गांधी को परोक्ष रुप से घेरने में कोई कमी नहीं छोड़ी, जो राहुल गांधी को येन केन प्रकारण भारतीय राजनीति में चलायमान रखना चाहती है, उनके वजूद को बनाए रखना चाहती है।

हालांकि गुलाम नबी आजाद ने अपने पत्र में सोनिया गांधी की कार्यशैली की तारीफ करते हुए कहा कि उनकी अध्यक्षता में पार्टी अच्छे से काम कर रही थी और सबसे मशविरा लिया जाता था। यानी उस दौर में कांग्रेस युवाओं के जोश और अनुभवी नेताओं के होश में संतुलन रखते हुए काम कर रही थी, लेकिन राहुल गांधी के आने के बाद यह परंपरा खत्म होने लगी।

उनके आते ही व्यवस्थाएं ध्वस्त होने लगीं, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। पार्टी छोड़ते हुए उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके राजनीति में आगमन के बाद पार्टी में वैचारिक और व्यावहारिक आपसी सहयोग, समन्वय और सलाह मशविरे की परंपराएं समाप्त हो गईं। वरिष्ठ और अनुभवी नेता हाशिए पर चले गए, उन्हें किनारे कर दिया गया और उनकी जगह गैर अनुभवी और चापलूस दरबारियों ने ले ली।

बदलती कांग्रेस का रेखाचित्र खेंचते हुए गुलाम नबी आजाद ने उस वाकये का भी जिक्र किया, जो आज भी राहुल गांधी की राजनीतिक समझ और परिपक्वता पर सवालिया निशान लगाता है और 2014 की जबरदस्त हार के कई कारणों में से एक तात्कालिक कारण भी बना। कैबिनेट के प्रस्ताव को मीडिया के सामने आकर उसे फाड़ देना, एक तरह से संवैधानिक सरकार के प्रति नाफरमानी के इजहार को जनता ने स्वीकार नहीं किया और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।

हालांकि उसके बाद से लेकर आज तक गुलाम नबी आजाद ने राज्यसभा में मोदी सरकार की नीतियों की जमकर मुखालफत की, पार्टी के नजरिये का जमकर बचाव किया और कभी भी अपने कार्य व्यवहार से विरोधी दलों में कोई वैमनस्यता नहीं रखी, यह उनके पूरे राजनीतिक जीवन की उपलब्धि है। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने जिस सादगी और सौम्यता का लबादा ओढ़े रखा, उसे आज भी बड़ी शिद्धत के साथ पाक साफ बनाए रखने की जिम्मेदारियों का वहन कर रहे हैं।

पांच से अधिक दशक से कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता के रुप में अपनी अलग पहचान बनाने वाले गुलाम नबी आजाद का पार्टी से इस तरह मोहभंग हो जाना, कोई एक दिन या अचानक सामने आनी वाली घटना नहीं है। करीब एक दशक से आग उनके भीतर सुलग रही थी। गाहे बगाहे अपने अंतरमन में जल रही इस चिंगारी का धुंआ, कभी कभी गुबार बन कर दिखाई दे रहा था, लेकिन कोई नासमझ की तरह उनके अंदर की धधकती चिंगारियों की गरमाहट को महसूस न करे, तो यह उनके राजनीतिक अनाड़ीपन को ही दर्शाता है।

एक समय था जब गुलाम नबी आजाद सबसे ताकतवर और कद्दावर नेताओं में से एक हुआ करते थे। पार्टी का सबसे सौम्य मुस्लिम चेहरा थे। इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी की जयपुर में हुई ताजपोशी तक उन्हें गंभीरता से लिया जाता था। लेकिन कांग्रेस ने जब नवसंस्कृतीय आचरण में ढ़लना प्रारंभ किया, गुलाम नबी आजाद जैसे नेता तेजी से भागने और बदलाव के बयार को महसूस करने वाली पार्टी में खुद को असहज मानने लगे।

2019 में जब एक बार लगने लगा कि कांग्रेस फिर से राजनीतिक दृष्टि से मजबूत होने का प्रयास कर रही है, चुनाव परिणामों ने रही सही उम्मीद भी धूमिल कर दी। और तो और, उसके बाद होने वाले प्रादेशिक विधानसभा चुनावों में भी लगातार हार से राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे तो कांग्रेस का जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता भी हताश और निराश हो गया। अनुभवी नेताओं की खामोशी और निष्क्रियता से पार्टी राजनीतिक रुप से कमजोर होने लगी। धीरे धीरे कांग्रेस के नेता अपने राजनीतिक वजूद को बनाए रखने के लिए दूसरी पार्टियों का दामन थामने लगे।

दो चार दिन पहले प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने पार्टी छोड़ते वक्त सोनिया गांधी को लिखे पत्र में यह कहा भी था कि मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि निर्णय लेना अब जनता और देश के हितों के लिए नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के स्वार्थी हितों से प्रभावित है, जो चाटुकारिता में लिप्त हैं और लगातार जमीनी हकीकत की अनदेखी कर रहे हैं। गुलाम नबी आजाद ने भी सोनिया गांधी को लिखे पत्र में कमोबेश ऐसी ही बात कही।

आनंद शर्मा हो या फिर कपिल सिब्बल, यूपी, हरियाणा, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश के युवा हो या अनुभवी नेता, सभी ने हर स्तर पर अपनी बात को रखने का प्रयास किया, लेकिन उनकी बातों को अनसुना कर दिया गया। आजाद ने कई बार पार्टी के हालात पर अपनी चिंताएं जताईं लेकिन आलाकमान पर कोई असर नहीं हुआ।

कांग्रेस जम्मू कश्मीर की विधानसभा चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही थी, उससे ऐनवक्त पहले गुलाम नबी आजाद ने पार्टी की कैंपेन कमेटी और राजनीतिक मामलों की समिति के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर अपने संकेत दे दिए थे। उस समय भी उन्होंने आलाकमान को अपनी नाराजगी का इजहार किया था।

इससे पहले, राज्यसभा से उनके विदाई समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण से कयास लगाए जा रहे थे कि गुलाम नबी आजाद राजनीति में कुछ नया करेंगे। उनके इस भाषण के राजनीतिक गलियारों में कई कयास भी लगाए गए। बाद में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का उनको दरकिनार करना संकेतों में काफी कुछ कह गया।

गांधी परिवार की पीढ़ियों की राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ते उतरते गुलाम नबी आजाद जी-23 के उन नेताओं में शामिल रहे हैं, जो 2019 से लगातार पार्टी की कार्यशैली में बदलाव के विचारों को साथ में लेते हुए अपने अनुभवों को सांझा करते रहे, लेकिन सब बेकार होते चले गए। यह खत नहीं, सदा ए दिले दर्द मंद है, जिसमें आजाद जैसे नेताओं का पार्टी के प्रति प्रेम और प्यार झलकता है, लेकिन उस प्यार की कद्र नहीं हुई।

आज जब सोनिया गांधी अपने इलाज के सिलसिले में अमेरिका गई है, उस वक्त इस तरह का पत्र सार्वजनिक होना, उनके समकालीन और नजदीक साथियों में से एक राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को नागंवार गुजरा। उन्होंने इस घटना को दुखद बताया और इसे मानव स्वभाव के खिलाफ बताते हुए संवेदनशीलता के खिलाफ माना।

इससे पहले भी जब सोनिया गांधी बीमार थी तब भी गुलाब नबी आजाद ने पत्र लिखकर अपनी नाराजगी को जाहिर किया था। अशोक गहलोत ने यह भी कहा कि कांग्रेस ने उन्हें पूरा सम्मान दिया, अवसर की कोई कमी नहीं रही और 42 साल तक जिनको हमेशा पदों पर रखा हो, केंद्रीय मंत्री, एआईसीसी का महामंत्री, प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर का चीफ मिनिस्टर, सब कुछ मिला हो, उनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। आजाद के चापलूसी वाले शब्दों का जिक्र करते हुए गहलोत ने कहा कि वे संजय गांधी के राजनीतिक दौर की उपज थे, उस समय पर भी उनके साथ रहने वालों को चापलूस ही माना जाता था।

आजाद के इस्तीफे वाले खत में राहुल गांधी के बारे ये कहना कि वो बच्चों जैसी बातें करते हैं, ने अशोक गहलोत को भी हैरान और परेशान कर दिया। उनकी इस हरकत से वे इस बात को लेकर सदमे में हैं कि एक ऐसा व्यक्ति जिसे 42 साल तक जिंदगी में सब कुछ मिला, जो 42 साल बिना पद के नहीं रहा हो, वह व्यक्ति आज यह मैसेज दे रहे हैं, जो उनकी समझ के परे है।

अब जबकि गुलामनबी आजाद कांग्रेस की लक्ष्मण रेखा से बाहर निकल चुके है, आजाद हो चुके हैं, भारी मन से बाहर आ गए हैं तो कमर जलालवी की गजल का वह शेर मौजूं लगता है कि ऐ मेरे हमनशीं चल कहीं और चल, इस चमन में अब अपना गुजारा नहीं, बात होती गुलों तक तो सह लेते हम, अब तो कांटों पे भी हक हमारा नहीं।

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