समय का चक्रव्यूह:जब राजनीति के ‘सूरमा’ फर्श से अर्श और फिर अर्श से फर्श पर आ गए!

News Desk

मेहमान की कलम से – मोहम्मद शाहिद, वरिष्ठ पत्रकार

राजनीति की बिसात पर मोहरे कब मात खा जाएं और कब शहंशाह वजीर से फकीर बन जाए, यह कोई नहीं कह सकता। मध्य प्रदेश और राजस्थान की सियासत के दो ऐसे ही

कद्दावर नाम हैं—नरोत्तम मिश्रा और राजेन्द्र राठौड़।

एक समय था जब इन दोनों नेताओं की तूती बोलती थी, सत्ता का पूरा केंद्र इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता था। लेकिन आज वक्त ने ऐसी करवट ली है कि दोनों अपनी खुद की विधानसभा सीट तक नहीं बचा पाए और विधायक तक नहीं हैं।यह सियासी बदलाव उन सभी के लिए एक बहुत बड़ा सबक है जो सत्ता के नशे में जमीन छोड़ देते हैं।

1. नरोत्तम मिश्रा: मध्य प्रदेश भाजपा के ‘गब्बर’ का पतन

मध्य प्रदेश की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान के बाद अगर किसी का नाम सबसे भारी माना जाता था, तो वह थे नरोत्तम मिश्रा। लगभग 20 सालों तक वे एमपी भाजपा का दूसरा सबसे बड़ा चेहरा रहे।

सत्ता का पावर हाउस:
वे सिर्फ एक मंत्री नहीं थे, बल्कि सरकार के संकटमोचक और ‘सुपर सीएम’ की तरह काम करते थे। गृह मंत्री रहते हुए उनके तेवर, उनके बयान और उनका रसूख ऐसा था कि पूरी ब्यूरोक्रेसी और विपक्ष उनके सामने पानी भरता था।

एक झटके में ढहा किला:
2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया सीट से उनकी हार ने सबको स्तब्ध कर दिया। जिस नेता के इशारे पर पूरी प्रदेश की राजनीति हिलती थी, जनता ने उन्हें उनके ही गढ़ में मात दे दी। आज मोहन यादव सरकार में वे सत्ता के गलियारों से पूरी तरह बाहर हैं।

2. राजेन्द्र राठौड़:

राजस्थान भाजपा के चाणक्य की शिकस्त

राजस्थान की राजनीति में राजेंद्र राठौड़ का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था। भैरों सिंह शेखावत से लेकर वसुंधरा राजे के दौर तक, राठौड़ भाजपा के सबसे कद्दावर और रणनीतिकार नेताओं में शुमार रहे।
विपक्ष की बोलती बंद करने वाले नेता:
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहते हुए उन्होंने अकेले दम पर कांग्रेस सरकार को नाकों चने चबवा दिए थे। उनकी मर्जी के बिना राजस्थान भाजपा में पत्ता भी नहीं हिलता था। वे खुद को भावी मुख्यमंत्री की रेस में देख रहे थे।

ओवरकॉन्फिडेंस पड़ा भारी:

चुरू छोड़कर तारानगर से चुनाव लड़ना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। जनता ने उनके दशकों पुराने रसूख को दरकिनार करते हुए उन्हें चुनावी मैदान में धूल चटा दी। नतीजा यह हुआ कि राजस्थान में भाजपा की सरकार तो बन गई, लेकिन ‘किंगमेकर’ राठौड़ खुद सत्ता से बेदखल हो गए।

सत्ता का शाश्वत नियम:

“जब पावर हो, तो जमीन मत छोड़ो”यह संदेश हर उस इंसान के लिए एक कड़वा सच है जो कुर्सी मिलते ही अहंकार के सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। इतिहास गवाह है कि समय की लाठी में आवाज नहीं होती, लेकिन उसकी मार बहुत गहरी होती है।जो कभी मीडिया के कैमरों और सुरक्षाकर्मियों के लाव-लश्कर से घिरे रहते थे, आज वे हाशिए पर हैं।जो कभी टिकट बांटते थे, आज वे खुद एक अदद पद के लिए कशमकश कर रहे हैं।

सीख साफ़ है:

वक्त बदलते देर नहीं लगती। जब आपके पास ताकत हो, पद हो, और पैसा हो, तब इंसान को अपने पैर हमेशा जमीन पर रखने चाहिए। क्योंकि जनता जब अर्श पर बैठा सकती है, तो वक्त आने पर फर्श पर पटकने में भी देर नहीं लगाती! आज ये दोनों नेता इस बात का सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण हैं।

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