Jaipur : राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के नतीजों के बाद मेयर और चेयरमैन की कुर्सियों को लेकर सियासी जोड़-तोड़ तेज है। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा पर धनबल, पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी के कथित इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए हमला बोला है। गहलोत ने दावा किया कि निर्दलीय और दूसरे दलों के पार्षदों को अपने पक्ष में करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और भाजपा समर्थित बोर्ड बनाने की कोशिश हो रही है। इन आरोपों को भाजपा ने खारिज किया है।
गहलोत ने 17 सितंबर को लगाए आरोपों में कहा कि भाजपा की ओर से पार्षदों को अपने पाले में लाने के लिए 1.5 करोड़ से 2.5 करोड़ रुपये तक के प्रलोभन दिए जाने की बात सामने आ रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंत्रियों और सरकारी तंत्र का इस्तेमाल बोर्ड गठन को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। भाजपा की ओर से पहले कहा गया है कि कांग्रेस हार के बाद इस तरह के आरोप लगा रही है और निर्दलीय पार्षदों से समर्थन मांगना दोनों दलों की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
इससे पहले गहलोत ने पुलिस और प्रशासन पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ इलाकों में निर्दलीय और कांग्रेस समर्थित पार्षदों पर दबाव बनाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल किया जा रहा है। गहलोत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पुलिस महानिदेशक से कानून-व्यवस्था की मशीनरी को राजनीतिक दबाव से दूर रखने की अपील की थी। भाजपा ने इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताया।
गहलोत ने यह सवाल भी उठाया कि यदि कोई व्यक्ति मेयर या चेयरमैन बनने के लिए कथित तौर पर करोड़ों रुपये खर्च करता है, तो वह बाद में उस रकम की भरपाई कैसे करेगा। उन्होंने आशंका जताई कि इसका असर शहरों के विकास कार्यों पर पड़ सकता है और सड़क, नाली, पट्टे तथा दूसरे कामों में भ्रष्टाचार की गुंजाइश बढ़ सकती है। यह गहलोत की राजनीतिक आशंका है, जिसका स्वतंत्र रूप से कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
निकाय चुनावों में इस बार कई जगह किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में निर्दलीय पार्षदों और छोटे दलों से जुड़े निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। राज्य के 309 शहरी निकायों में हुए चुनावों के बाद करीब 174 निकाय ऐसे हैं, जहां भाजपा या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इसी वजह से बोर्ड गठन से पहले समर्थन जुटाने की कवायद तेज है।
गहलोत ने इसी राजनीतिक माहौल के बीच UPI पर प्रस्तावित MDR को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाने का फैसला अमेरिकी दबाव में लिया गया है और इसका असर आम लोगों तथा कारोबारियों पर पड़ेगा। केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि MDR व्यवस्था का उद्देश्य UPI इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है।
नई व्यवस्था में 2,000 रुपये तक के पात्र मर्चेंट UPI भुगतान और सभी P2P लेनदेन शुल्क-मुक्त रहेंगे, जबकि निर्धारित श्रेणी के 2,000 रुपये से अधिक के P2M लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। सरकार के अनुसार करीब 96 प्रतिशत मर्चेंट लेनदेन इस बदलाव से प्रभावित नहीं होंगे। साथ ही MDR को ग्राहक से अलग से वसूलने की व्यवस्था नहीं है।
इस तरह राजस्थान की स्थानीय राजनीति में मेयर-चेयरमैन चुनाव का गणित और UPI-MDR का राष्ट्रीय मुद्दा, दोनों गहलोत के ताजा राजनीतिक हमले का हिस्सा बने हैं। एक तरफ निकायों में बहुमत जुटाने के लिए पार्षदों की गिनती और संपर्क का दौर चल रहा है, तो दूसरी तरफ आरोप-प्रत्यारोप ने इस पूरी प्रक्रिया को और राजनीतिक बना दिया है। अब असली तस्वीर उन निकायों में बोर्ड गठन के बाद साफ होगी, जहां किसी दल के पास अपने दम पर बहुमत नहीं है।