राजस्थान के नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने पचपदरा रिफाइनरी परियोजना की देरी और बढ़ती लागत को भाजपा सरकार के राजनीतिक राजहठ का नतीजा बताते हुए कहा कि जिस परियोजना की शुरुआत 37 हजार करोड़ रुपये की लागत से हुई थी, वह अब करीब 80 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। उन्होंने दावा किया कि यह लागत वृद्धि जनता के खर्च पर हो रही है और यह जनता के पैसे की बड़ी बर्बादी है। उनका कहना है कि अगर यह परियोजना समय पर पूरी होती तो आज प्रदेश के लाखों युवाओं को सीधा व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल चुका होता, लेकिन भाजपा ने इसे जानबूझकर वर्षों तक ठंडे बस्ते में डालकर राजस्थान के विकास को रोका और रोजगार के अवसरों को लुटा दिया।
जूली ने बिजनौरा रिफाइनरी योजना के संदर्भ में मुख्यमंत्री की पचपदरा विजिट पर भी तीखा विरोध जताया और कहा कि अब मुख्यमंत्री जी पचपदरा जाकर केवल टेंट, कुर्सी और भीड़ जुटाने वाली व्यवस्थाओं को अपनी बड़ी उपलब्धि समझ रहे हैं, जबकि असली जिम्मेदारी तो प्रोजेक्ट को समय पर पूरा करवाने, रोजगार पैदा करने और लागत बढ़ने से बचाने की होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर भाजपा ने इतने वर्षों तक इस रिफाइनरी परियोजना को ठंडे बस्ते में क्यों डाले रखा और इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा? उनका तर्क है कि विकास टेंट और कुर्सी से नहीं होता, बल्कि वह तब होता है जब प्रोजेक्ट समय पर पूरे किए जाते हैं और युवाओं को रोजगार, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के अवसर मिलते हैं, जिनमें भाजपा ने राजस्थान में चूक पूरी तरह की है।
अपने बयान में जूली ने महिला आरक्षण बिल को भी राजनीतिक विश्लेषण के तहत उठाया और कहा कि यह व्यवस्था कांग्रेस की ही मौलिक सोच और नीतिगत प्रस्ताव का नतीजा है, यानी इसे कांग्रेस ने ही पहली बार गंभीरता से उठाया था। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा की नीति व नीयत वास्तव में सही है तो उसे महिला आरक्षण से ज़्यादा महिला सुरक्षा और सुरक्षित वातावरण पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि राजस्थान में लगातार महिला विरोधी अपराध और यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में वृद्धि दर्ज की जा रही है। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि जब महिला आरक्षण बिल को जनगणना और परिसीमन के बाद लागू करना है तो ऐसे समय पर इसे लाने की जल्दबाजी चुनावी राजनीति के लिए वोट बैंक बनाने का प्रयास लगती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिसीमन आयोग का गठन अभी तक नहीं हुआ है, फिर भी भाजपा नेता इस आयोग के निर्णयों को लेकर “दिव्य ज्ञान” जैसे बयान दे रहे हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के साथ खिलवाड़ और जनता को भ्रमित करने का प्रयास है।
टीकाराम जूली ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि वह लगातार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और पंगु बनाने का काम कर रही है। उनका दावा है कि सरकार खुद जानती है कि वह जनता का विश्वास खो चुकी है, इसीलिए अपनी निश्चित पराजय से डरकर निकाय और पंचायत चुनाव कराने से भाग रही है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ने से डरना सरकार की सबसे बड़ी विफलता है और जब उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी चुनाव नहीं कराए जा रहे तो यह बेहद गंभीर संवैधानिक मुद्दा है। उन्होंने यह भी बताया कि आज स्थिति इतनी खराब है कि जनता की समस्याएं सुनने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं, बल्कि केवल प्रशासक बैठे हैं, जो लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करने जैसा है। उनका यह भी आह्वान रहा कि भाजपा सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग बंद करे, अन्यथा कांग्रेस पार्टी जनता की आवाज बनकर सड़क से लेकर सदन तक इस तरह की तानाशाही और लोकतंत्र विरोधी रुख का पुरजोर विरोध करेगी।
इसी बीच उन्होंने राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर भी आलोचनात्मक नज़र डाली और बताया कि जिस प्रदेश में सरकारी विद्यालयों की जर्जर इमारतें मरम्मत की मांग कर रही हैं, यहां तक कि न्यायालय की भी फटकार पड़ रही है और नामांकित विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए अधिक प्रयास आवश्यक हैं, ऐसे में शिक्षा विभाग अब ‘सार्थक नाम अभियान’ चला रहा है। जूली ने इस योजना के संदर्भ में एक विशेष बात उठाई और यह सवाल किया कि इस सूची में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल का नाम शामिल ही क्यों नहीं किया गया है। उन्होंने शिक्षा मंत्री से सीधे सवाल पूछा कि कहीं इसमें कोई राजनीतिक व व्यक्तिगत साजिश तो नहीं है और इस तरह के नाम की चुनिंदा अनुपस्थिति से किसे निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है।

