नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को रूस ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में अपना मध्यस्थ नियुक्त किया है। यह मामला यूक्रेन के सरकारी स्वामित्व वाले बैंक ओशचाडबैंक और रूस के बीच चल रहा है। विवाद रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूक्रेनी बैंक की संपत्तियों और कारोबारी गतिविधियों को हुए कथित नुकसान से जुड़ा है।
ओशचाडबैंक का दावा है कि रूस की सैन्य कार्रवाई के कारण उसे यूक्रेन के डोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया क्षेत्रों में मौजूद अपनी संपत्तियों और बैंकिंग कारोबार को नुकसान उठाना पड़ा। बैंक इसी नुकसान के लिए रूस से सैकड़ों मिलियन डॉलर के मुआवजे की मांग कर रहा है। बैंक के अनुसार, युद्ध के कारण उसे करीब 460 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है, जिसमें लगभग 379 मिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष नुकसान शामिल है।
यह कानूनी विवाद रूस और यूक्रेन के बीच 1998 में हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते के तहत शुरू किया गया है। ओशचाडबैंक का आरोप है कि रूस की सैन्य कार्रवाई के कारण उसके निवेश और संपत्तियों को नुकसान पहुंचा, जो इस निवेश संधि के प्रावधानों का उल्लंघन है। बैंक ने जुलाई 2025 में रूस को विवाद से संबंधित औपचारिक नोटिस भेजा था। इसके बाद मामला अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया तक पहुंचा।
इस मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण का गठन किया गया है। रूस की ओर से पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ को मध्यस्थ नियुक्त किया गया है, जबकि ओशचाडबैंक ने यूनान के निवासी और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के प्रोफेसर स्टावरोस ब्रेकौलाकिस को अपना मध्यस्थ चुना है। न्यायाधिकरण की अध्यक्षता कोस्टा रिका की पूर्व व्यापार मंत्री और मध्यस्थ डायाला जिमेनेज करेंगी, जिन्हें दोनों पक्षों की सहमति से चुना गया है।
इस तरह न्यायाधिकरण में रूस और ओशचाडबैंक की ओर से एक-एक मध्यस्थ होगा, जबकि अध्यक्ष दोनों पक्षों की सहमति से नियुक्त की गई हैं। अब यह पैनल दोनों पक्षों की दलीलों, दस्तावेजों और नुकसान से जुड़े दावों की समीक्षा करेगा। इसके बाद मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और संभावित मुआवजे को लेकर निर्णय लिया जाएगा।
डीवाई चंद्रचूड़ का नाम इससे पहले भी रूस से जुड़े कुछ अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में सामने आ चुका है। रिपोर्टों के मुताबिक, विंटरशॉल डी और उक्रेनर्गो से जुड़े मामलों में रूस ने उन्हें मध्यस्थ बनाने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने उन नियुक्तियों को स्वीकार नहीं किया था। मौजूदा मामले में उन्होंने रूस की ओर से मध्यस्थ के रूप में जिम्मेदारी स्वीकार की है।
यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि मामला सीधे रूस-यूक्रेन युद्ध, अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून और बड़े वित्तीय दावे से जुड़ा हुआ है। भारत के पूर्व CJI के तौर पर चंद्रचूड़ का न्यायिक अनुभव अब इस अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रक्रिया में इस्तेमाल होगा। हालांकि, मध्यस्थ के रूप में उनकी भूमिका किसी पक्ष की ओर से वकील के तौर पर पैरवी करने के बजाय विवाद का निष्पक्ष कानूनी निर्णय करने वाले पैनल के सदस्य की है।
ओशचाडबैंक की ओर से मांगा जा रहा मुआवजा कितना होगा और रूस की जिम्मेदारी किस हद तक तय होती है, इसका फैसला मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी होने के बाद होगा। फिलहाल इस मामले ने रूस-यूक्रेन विवाद से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कानूनी मामलों में भारत के पूर्व शीर्ष न्यायिक अधिकारी की भूमिका को लेकर खासा ध्यान आकर्षित किया है।