जयपुर। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में सोमवार को जनता के वोट से चुने गए पार्षदों ने अपने-अपने निकाय का अगला मुखिया चुन लिया। पांच नगर निगम समेत 273 नगरीय निकायों में मेयर, सभापति और अध्यक्ष पद के लिए मतदान हुआ। सुबह 10 बजे शुरू हुई प्रक्रिया के बाद जैसे-जैसे नतीजे आने लगे, कई जगह तस्वीर बिल्कुल सीधी रही, तो कई जगह चुनावी गणित ने ऐसा मोड़ लिया कि आखिरी फैसला एक वोट, निर्दलीयों के समर्थन या फिर सीधे लॉटरी से हुआ। यानी वार्ड का चुनाव खत्म होने के बाद असली सस्पेंस कुछ जगह पार्षदों की बैठक में शुरू हुआ।
झुंझुनूं की मलसीसर नगरपालिका इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण रही। यहां भाजपा के पवन कुमार और कांग्रेस के प्रवीण के बीच मुकाबला 10-10 वोट की बराबरी पर अटक गया। इसके बाद फैसला लॉटरी से हुआ और किस्मत ने भाजपा प्रत्याशी पवन कुमार का साथ दिया। मलसीसर में पार्षदों के चुनाव में कांग्रेस के 10, भाजपा के 7 और निर्दलीयों के 3 पार्षद चुने गए थे। ऐसे में कागज पर कांग्रेस आगे थी, लेकिन चेयरमैन की कुर्सी का रास्ता आखिरकार लॉटरी से होकर निकला।
दौसा की सिकराय नगरपालिका में मामला लॉटरी तक नहीं पहुंचा, लेकिन अंतर उतना ही मामूली रहा। भाजपा के कैलाश बैरवा ने कांग्रेस प्रत्याशी को 13-12 से हराया और महज एक वोट के अंतर से अध्यक्ष की कुर्सी अपने नाम कर ली। चूरू के बीदासर में भाजपा की सुमन अध्यक्ष बनीं। यहां भाजपा को 19, कांग्रेस को 15 और निर्दलीय प्रत्याशी को एक वोट मिला।
झुंझुनूं के डूंडलोद में चुनावी गणित ने अलग ही कहानी लिखी। यहां भाजपा के पास सिर्फ दो पार्षद थे, जबकि कांग्रेस के आठ और निर्दलीयों के 10 पार्षद थे। इसके बावजूद भाजपा के सचिन सैनी ने कांग्रेस के मनफूल को 11-9 से हराकर अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। यानी जिस निकाय में आंकड़ों की शुरुआती तस्वीर कांग्रेस के पक्ष में थी, वहां निर्दलीयों का समर्थन भाजपा के लिए निर्णायक साबित हुआ।
जयपुर जिले की शाहपुरा नगर परिषद में भी एक वोट ने पूरा खेल तय किया। भाजपा के रविश खटाणा को 28 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की मेघा चौधरी को 27 वोट मिले। खास बात यह रही कि 12 निर्दलीय पार्षदों में से आठ ने खटाणा के पक्ष में मतदान किया। 55 पार्षदों वाली परिषद में बहुमत का आंकड़ा 28 था और खटाणा ठीक उसी आंकड़े तक पहुंच गए।
सिरोही के माउंट आबू में भाजपा के सुनील आचार्य ने कांग्रेस के यश शर्मा को 19-6 से हराया। भाजपा के 15 पार्षदों के अलावा आरएलपी के एक और दो निर्दलीय पार्षदों का समर्थन उन्हें मिला। रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस खेमे का एक वोट भी भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में गया। नतीजा 12 वोट के अंतर से आया और यहां क्रॉस वोटिंग की चर्चा भी चुनावी समीकरण का हिस्सा बन गई।
बांसवाड़ा नगर परिषद में भाजपा के मुकेश सभापति चुने गए। कुल 60 वोटों में भाजपा को 37 और कांग्रेस को 23 वोट मिले। भाजपा को तीन निर्दलीय पार्षदों का समर्थन मिला, जबकि एक निर्दलीय ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। सूरौठ में भाजपा की कमला देवी महावर ने कांग्रेस की सोमोती को 11-9 से हराया।
हनुमानगढ़ के गोलूवाला में भी नंबरों ने कई सवाल छोड़ दिए। भाजपा के ताराचंद बावरी को 13 और कांग्रेस के भोलाराम खटीक को 12 वोट मिले। खास बात यह रही कि चुनाव में कांग्रेस के 10 पार्षद ही जीते थे। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी को मिले अतिरिक्त दो वोट स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गए और क्रॉस वोटिंग के कयास लगने लगे।
पाली के जैतारण में भाजपा के भेणाराम गहलोत नगरपालिका के चेयरमैन चुने गए। यहां भी क्रॉस वोटिंग चर्चा में रही। रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस के एक पार्षद ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया। हालांकि जैतारण में भाजपा ने पार्षद चुनाव में ही 25 में से 19 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया था, इसलिए यहां अध्यक्ष पद का चुनाव कई अन्य निकायों की तुलना में कम पेचीदा था।
बारां की अंता नगरपालिका में कांग्रेस के प्रदीप नागर ने एक वोट से जीत दर्ज की। भाजपा प्रत्याशी को 17 वोट मिले, जबकि नागर बहुमत हासिल कर अध्यक्ष बने। इस जीत के साथ अंता में कांग्रेस का बोर्ड लगातार चौथी बार बनने की जानकारी सामने आई है।
बांसवाड़ा की प्रतापपुर गढ़ी नगरपालिका में कांग्रेस प्रत्याशी को 14 और भाजपा को 11 वोट मिले। चुनाव से पहले कांग्रेस के 12, भाजपा के 11 और दो निर्दलीय पार्षद थे। दोनों निर्दलीयों में से एक ने भाजपा और दूसरे ने कांग्रेस का साथ दिया। इसके बावजूद कांग्रेस के खाते में 14 वोट पहुंचे, जिसके बाद एक भाजपा पार्षद की संभावित क्रॉस वोटिंग की चर्चा सामने आई।
सीकर जिले की दांतारामगढ़ नगरपालिका में कांग्रेस के भंवरलाल कुमावत ने अध्यक्ष पद का चुनाव जीता। उन्हें 14 वोट मिले, जबकि भाजपा को 11 वोट मिले। जीत के बाद कुमावत ने कस्बेवासियों का आभार जताया।
इन स्थानीय नतीजों में एक पैटर्न जरूर दिखाई दिया—जहां किसी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत था, वहां कुर्सी तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान रहा; लेकिन जिन निकायों में निर्दलीयों की संख्या ज्यादा थी या दोनों प्रमुख दलों के बीच अंतर कुछ वोटों का था, वहां असली चुनाव पार्षदों की बैठक में हुआ। राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों में निर्दलीयों ने बड़ी संख्या में वार्ड जीते हैं, जिससे कई जगह अध्यक्ष और सभापति चुनाव में उनका समर्थन निर्णायक बना। राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार 10,235 घोषित वार्डों में भाजपा ने 4,179, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते थे।
पांच नगर निगमों—उदयपुर, बीकानेर, अलवर, पाली और अजमेर—में भी सोमवार को मेयर पद के लिए मतदान हुआ। इन पांच निगमों के कुल 370 पार्षद मेयर का चुनाव कर रहे हैं। यहां भी भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने पार्षदों को एकजुट रखने के लिए बाड़ेबंदी की रणनीति अपनाई और निर्दलीय पार्षदों तथा संभावित क्रॉस वोटिंग पर नजर रही।
इससे पहले 32 निकायों में अध्यक्ष या मेयर का निर्विरोध निर्वाचन हो चुका था। इनमें भाजपा के 28, कांग्रेस के दो और दो निर्दलीय उम्मीदवार शामिल हैं। भरतपुर और भीलवाड़ा नगर निगम के मेयर भी निर्विरोध चुने जा चुके हैं। इस तरह सोमवार को जिन निकायों में मुकाबला हुआ, उनकी संख्या घटकर 273 रह गई।
अब नजर उन चार निकायों पर है, जहां चुनाव कार्यक्रम अलग रखा गया है। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम तथा सुकेत नगरपालिका में पुनर्मतदान के कारण मेयर और अध्यक्ष पद के चुनाव 25 सितंबर को होंगे। इन पदों के लिए मतदान के अगले दिन यानी 26 सितंबर को उपमहापौर और उपाध्यक्ष पदों की प्रक्रिया होगी।
राजस्थान के निकाय चुनावों का यह चरण एक बात साफ कर गया है—वार्ड जीतना पहला पड़ाव है, लेकिन बोर्ड बनाना अलग गणित। कहीं बहुमत ने रास्ता आसान किया, कहीं निर्दलीय निर्णायक बने, कहीं एक वोट ने बाजी पलटी और मलसीसर में तो फैसला मतगणना की मशीन से निकलकर सीधे लॉटरी की पर्ची तक पहुंच गया।