राहुल गाँधी को साजिशकर्ता का पता लगाकर फैसला करना चाहिए।
जयपुर | राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चार साल बाद जो बोले है, उससे कांग्रेस की राजनीति गरमा गई है। पार्टी के भीतर आम चर्चा शुरू हो गई है कि अब राहुल गांधी को सच्चाई का पता लगाना चाहिए। उसके बाद ही राजस्थान और दूसरे राज्यों के फैसले करने चाहिए। इसका कारण यह बड़ा सवाल है कि आखिर वह साजिशकर्ता कौन है, जिसने अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनने से रोका। यही नहीं, राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के दौरान विवाद किसने करवाया था। प्रियंका गांधी ने उस समय खुद अध्यक्ष पद पर दावेदारी ठोक दी थी। फिर सोनिया गांधी ने उन्हें जैसे-तैसे मनाया। इसके चलते परिवार में खींचतान की खबरें बाहर आई थीं।
इसका असर यह हुआ कि पार्टी को राजस्थान और केंद्र दोनों जगह बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। पार्टी कमजोर होती चली गई। भाजपा जो चाहती थी, वह हो गया, क्योंकि गांधी परिवार के सबसे बड़े संकट मोचक गहलोत को पार्टी से दूर कर दिया। इन्हीं संकट मोचक गहलोत ने मई 2022 में उदयपुर में संकल्प सम्मेलन करवा कर पूरी कांग्रेस को संदेश दिया था कि राहुल गांधी ही कांग्रेस के नेता हैं और उनके ही आदेश सब को मानने पड़ेंगे। इस सम्मेलन के बाद असंतुष्ट गुट खत्म हो गया था। सोनिया गांधी भी जानती थी गहलोत ने असंतुष्ट गुट को शांत करने के लिए सम्मेलन बुलाया था। इसके बाद भी 25 सितंबर 2022 को उनके खिलाफ ही बड़ी साजिश रच कर उन पर तमाम आरोप लगा दिए गए।
गहलोत पर ही बगावत के आरोप
कुछ लोगों ने इस तरह का प्रचार कर दिया कि गहलोत ने विधायकों से बगावत करवा दी। बिना सच जाने ऐसा माहौल बना दिया कि गहलोत सीएम की कुर्सी नहीं छोड़ना चाहते थे, जबकि सच्चाई इसके विपरीत थी। इस साजिश ने कांग्रेस को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाया। पार्टी 2023 में राजस्थान जैसे राज्य का अहम चुनाव हार गई। उस समय उन सब घटनाओं के मुख्य केंद्र बिंदु में सचिन पायलट ही थे, क्योंकि सचिन पायलट ने चुनाव से कुछ समय पूर्व अपनी सरकार के खिलाफ यात्रा निकाल माहौल फिर बिगाड़ा था। उस समय प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने सचिन के निष्कासन की सिफारिश की थी, लेकिन फिर उसी लॉबी ने जिसने अध्यक्ष के चुनाव के समय साजिश की थी, उसने ही निष्कासन रुकवा दिया। मध्य प्रदेश के एक बड़े नेता ने सचिन को पार्टी से बाहर होने से बचाया था।
सचिन ने अपनी ही सरकार गिराने की कोशिश की थी
इससे पूर्व 2020 में सचिन पायलट ने उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष होते हुए खुद अपनी सरकार गिराने की कोशिश की थी। किसी भी राजनीतिक दल के इतिहास में यह ऐसा पहला मामला था, जिसमें मुखिया ने ही विरोधी दल भाजपा से हाथ मिला अपनी सरकार गिराने में कोई कमी नहीं रखी।
इस घटना के बाद पार्टी के सर्वोच्च नेता राहुल गांधी ने सचिन पायलट को पार्टी से बाहर करने का मन बना लिया था, लेकिन तब अहमद पटेल ने उनके निष्कासन को रोका था। इतने बड़े धोखे के बाद भी दो साल में ऐसा क्या हुआ कि गांधी परिवार ने अचानक यू टर्न लेते हुए सचिन पायलट को सीएम योग्य मान लिया। पार्टी के साथ खड़े रहने वाले 90 विधायकों की मर्जी जाने बिना उनका नेता बनाने का फैसला कर लिया। ये वे विधायक थे, जिन्होंने करोड़ों रुपये का ऑफर ठुकरा पार्टी और अपनी सरकार को बचाने के लिए सचिन के खिलाफ सब कुछ दांव पर लगा दिया था। गांधी परिवार ने सचिन को सीएम बनाने का फैसला उस समय किया, जब सब कुछ तय रणनीति के हिसाब से चल रहा था।
अगस्त 2022 में अशोक गहलोत के नेतृत्व में चला आंदोलन:
अगस्त 2022 में राहुल गांधी के खिलाफ ईडी की कार्रवाई को लेकर दिल्ली में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस ने बड़ा आंदोलन चलाया। गहलोत ने दूसरे साथ खुद भी गिरफ्तारी दी थी। तब वह राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद 4 सितंबर 2022 की रामलीला मैदान में होने वाली रैली से पहले सब कुछ तय हो गया था कि अशोक गहलोत पार्टी के अगले अध्यक्ष होंगे। उन्होंने अपनी स्वीकृति भी दे दी थी। कांग्रेस ने भी घोषणा कर दी थी। पार्टी में बड़ा उत्साह था। महंगाई के खिलाफ 4 सितंबर 2022 की रैली में राहुल गांधी मुख्य वक्ता थे, लेकिन अगले अध्यक्ष के रूप में गहलोत को महत्व दिया गया था। उसी दिन शाम को जोधपुर हाउस में देशभर के कांग्रेसी नेताओं ने गहलोत को बधाई दी।
फिर यूं बदले हालात:
7 सितम्बर 2022 को भारत जोड़ो यात्रा शुरू कराने के बाद गहलोत जयपुर लौट आए। इससे पहले 27 अगस्त 2022 को इटली में सोनिया गांधी की मां का निधन हो गया। पूरा गांधी परिवार इटली चला गया। केवल राहुल गांधी 4 सितंबर की रैली के चलते वापस लौट आए। सोनिया गांधी और उनकी बेटी प्रियंका गांधी सितंबर दूसरे सप्ताह में भारत वापस आए।
उनकी वापसी के वाद ही अचानक कांग्रेस की राजनीति में बड़ा यू टर्न आया। राहुल गांधी यात्रा में व्यस्त थे, तभी 11 सितंबर के बाद राजस्थान में खबरें चलने लगीं कि सचिन पायलट अगले सीएम होंगे। सचिन के समर्थक प्रचार में जुट जश्न की तैयारी में लग गए और राजस्थान कांग्रेस सकते में आ गई। सरकार बचाने वाले विधायक अपने को ठगा महसूस करने लगे। सब के अंदर यह बात घर कर गई कि अब उनसे राजनीतिक बदला लिया जाएगा। वो लोग ताकतवर हो जाएंगे, जिन्होंने पार्टी तोड़ने की कोशिश की। उसके बदले में पार्टी तोड़ने वाले विधायकों ने भाजपा से 10 से 20 करोड़ रुपये लिए थे। गहलोत खुले आम कह चुके थे कि दिल्ली में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के घर पर करोड़ों की लेनदेन हुआ था। एक अनुमान है कि 250 करोड़ से ज्यादा पैसा दिया गया, क्योंकि 27 विधायक लाने का ठेका हुआ था। सरकार की सजगता से 17 ही विधायक मानेसर पहुंचे और खेल बिगड़ गया। ऐसे में सरकार बचाने वाले विधायकों को लगा कि जिन्होंने पार्टी के साथ धोखा किया उन्हें कमान दी जा रही है। यह फैसला हैरानी वाला इसलिए था कि गांधी परिवार अपने भरोसेमंद जिस गहलोत को पार्टी अध्यक्ष बनाने जा रहा था, उससे कोई चर्चा ही नहीं की गई। इससे यही संदेश गया कि कोई बहुत बड़ी साजिश हो गई है।
गहलोत को अध्यक्ष बनने से रोकने की साजिश:
साजिश यही थी कि गहलोत को अध्यक्ष बनने से रोका जाए। पार्टी का बड़ा धड़ा और राजनीति के जानकार भी मानते हैं कि गहलोत अगर अध्यक्ष बन गए होते तो राहुल गांधी को बड़ी ताकत मिलती और पार्टी मजबूत होती, लेकिन जिसने भी षड्यंत्र किया उसने एक तीर से कई निशाने साधे। इस षड्यंत्र में पार्टी का कोई नेता शामिल था, जिसने भाजपा की ‘मर्जी की कर दी। यह व्यक्ति परिवार से था या कोई अन्य, यह जांच का विषय है।
गहलोत ने केवल अपनी पीड़ा व्यक्त कीः
गहलोत ने अपनी पीड़ा व्यक्त कर जिस तरह से सचिन पायलट को निशाने पर लिया, उससे यह तो साफ हो गया कि पार्टी में बड़ा संकट आने वाला है। गांधी परिवार को राजस्थान का फैसला करने से पूर्व 2022 में घटे पूरे घटनाक्रम की जांच करानी चाहिए और प्रदेश के मौजूदा नेताओं से एक-एक कर सच का पता लगाना चाहिए। पूरे देश में राजस्थान ही एक मात्र ऐसा राज्य है जहां पर कुछ उम्मीद है। अगर यह राज्य भी हाथ से निकल गया तो यह भी उत्तर प्रदेश बन जाएगा
साभार : INDIA NEWS