नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 80वें स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर सियासी विवाद खड़ा हो गया है। लाल किले से अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा था कि देश ने हथियारबंद नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन नक्सली विचारधारा से प्रभावित कुछ लोग अब भी मौजूद हैं। उनके इसी बयान को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सरकार असहमति की आवाजों को निशाना बनाने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रही है।
विवाद बढ़ने के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द विपक्षी नेताओं या किसी राजनीतिक दल के लिए इस्तेमाल नहीं किया था। रिजिजू के मुताबिक, पीएम मोदी का इशारा उन लोगों की ओर था जो माओवाद का समर्थन करते हैं, संविधान को नकारते हैं, अलगाववादी गतिविधियों का समर्थन करते हैं या देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली सोच के साथ खड़े हैं।
रिजिजू ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी को उसके पूरे संदर्भ में समझने की जरूरत है। उन्होंने पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले ‘चिकन नेक’ इलाके का जिक्र करते हुए कहा कि जो लोग इस रणनीतिक गलियारे को काटकर पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बातें करते हैं, उन्हें भी पीएम की टिप्पणी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ‘चिकन नेक’ पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी क्षेत्र में स्थित संकरा भू-भाग है, जो पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।
रिजिजू की सफाई के बावजूद विपक्ष ने इस बयान को लेकर प्रधानमंत्री पर निशाना साधना जारी रखा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर तंज कसा और कहा कि अगर इस पहचान का मतलब देश के सवाल उठाना और सरकार से जवाब मांगना है, तो उन्हें इस पर गर्व है। उनके इस बयान के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी और तेज हो गई।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, असहमति जताना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना संवैधानिक अधिकार है। उनके मुताबिक, ऐसे विचारों को नक्सलवाद से जोड़ना राजनीतिक बहस को गलत दिशा में ले जा सकता है। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी वैचारिक असहमति के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ताकतों के खिलाफ थी जो हिंसा, माओवाद, अलगाववाद या संविधान-विरोधी गतिविधियों का समर्थन करती हैं।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण में नक्सलवाद, देश की एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर खास जोर रहा। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में हथियारबंद नक्सलवाद के खिलाफ देश की प्रगति का जिक्र किया और कहा कि अब चुनौती उन विचारों से है जो युवाओं और समाज को गलत दिशा में ले जा सकते हैं।
अब मामला सिर्फ एक शब्द के इस्तेमाल तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ सरकार इस बयान को राष्ट्रीय एकता और माओवादी विचारधारा के खिलाफ चेतावनी बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक असहमति को दबाने वाली भाषा के रूप में देख रहा है।