राजस्थान निकाय चुनाव के बाद BJP-कांग्रेस में घमासान, निर्दलीय पार्षदों पर नजर; कई शहरों में फंसा बोर्ड

News Desk

Jaipur : राजस्थान निकाय चुनाव में वोटरों ने अपना फैसला सुना दिया, लेकिन कई शहरों में असली सियासी खेल अब शुरू हुआ है। नतीजे आने के बाद जहां एक तरफ BJP और कांग्रेस अपनी-अपनी जीत का हिसाब बता रही हैं, वहीं दूसरी तरफ नजर उन पार्षदों पर टिक गई है जो किसी एक खेमे में नहीं हैं। कई निकायों में निर्दलीय पार्षद अब सिर्फ संख्या नहीं, बोर्ड गठन की चाबी बन गए हैं। यही वजह है कि चुनाव खत्म होते ही समर्थन जुटाने, संपर्क साधने और पार्षदों को अपने पाले में रखने की कवायद तेज हो गई है।

राजस्थान के 309 शहरी निकायों में हुए चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि BJP राज्य स्तर पर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन हर शहर में कहानी एक जैसी नहीं है। जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा जैसे नगर निगमों में BJP को स्पष्ट बहुमत मिला, जबकि बीकानेर में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया। दूसरी तरफ अजमेर, जोधपुर, अलवर और पाली जैसे बड़े निकायों में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला। यानी प्रदेश की सियासत में एक तरफ बहुमत की सरकार है, तो दूसरी तरफ कई शहरों में बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों की तरफ देखना पड़ रहा है।

सबसे ज्यादा हलचल खैरथल में दिखाई दे रही है। 45 वार्ड वाली खैरथल नगर परिषद में कांग्रेस 20 सीटों के साथ सबसे आगे रही, जबकि BJP को 8 और निर्दलीयों को 17 सीटें मिलीं। बहुमत के लिए 23 पार्षद चाहिए। ऐसे में कांग्रेस बहुमत से तीन कदम दूर है, लेकिन 17 निर्दलीयों की मौजूदगी ने पूरा खेल खुला रखा है। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विक्रम सिंह उर्फ विक्की चौधरी के BJP में शामिल होने और उनके साथ 11 पार्षदों के आने के दावे ने यहां की राजनीति और गर्म कर दी है। हालांकि यह दावा राजनीतिक पक्ष की ओर से है और अंतिम बोर्ड गठन की तस्वीर आगे की प्रक्रिया में ही साफ होगी।

खैरथल की राजनीति में यही वह जगह है जहां चुनावी गणित एक्सेल शीट से निकलकर सीधे सियासी संपर्कों तक पहुंच गया है। जिस निर्दलीय पार्षद को चुनाव से पहले शायद सिर्फ एक वार्ड का उम्मीदवार माना जा रहा था, अब उसी के पास बोर्ड की चाबी होने की स्थिति बन सकती है। BJP और कांग्रेस दोनों के लिए यही चुनौती है—किसे साथ लाया जाए और कितना साथ रखा जाए।

अजमेर में भी कहानी कुछ ऐसी ही है। 80 वार्डों वाले नगर निगम में कांग्रेस ने 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बनने का रास्ता बनाया, जबकि BJP 32 पर रही और 11 सीटें निर्दलीय या अन्य उम्मीदवारों के खाते में गईं। बहुमत के लिए 41 पार्षद चाहिए। कांग्रेस को चार अतिरिक्त समर्थन चाहिए, जबकि BJP को नौ। ऐसे में 11 पार्षदों का छोटा-सा समूह दोनों दलों के लिए बड़ा राजनीतिक महत्व रखता है।

जोधपुर में तो मुकाबला और भी बराबरी वाला है। BJP और कांग्रेस ने 44-44 वार्ड जीते हैं। बाकी 12 सीटें निर्दलीय और अन्य उम्मीदवारों के पास हैं। 100 सदस्यीय निगम में बहुमत के लिए 51 का आंकड़ा चाहिए। यानी दोनों पार्टियों को सात अतिरिक्त पार्षदों की जरूरत है। यहां किसी एक-दो पार्षद का इधर से उधर होना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरा छोटा समूह ही बोर्ड की दिशा तय कर सकता है।

अलवर में BJP 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, जबकि कांग्रेस 23 सीटों पर रही। निर्दलीयों और अन्य उम्मीदवारों की सीटें मिलाकर यहां भी बहुमत का रास्ता सीधा नहीं है। पाली में भी कांग्रेस और BJP के बीच अंतर है, लेकिन निर्दलीयों की संख्या इतनी है कि बोर्ड गठन के लिए दोनों दलों को उनसे संपर्क साधना पड़ सकता है। यही वजह है कि इन शहरों में नतीजों के बाद पार्टी कार्यालयों से ज्यादा हलचल पार्षदों के संपर्कों और बैठकों के इर्द-गिर्द दिखाई दे रही है।

बीकानेर में स्थिति बाकी शहरों से अलग है। यहां कांग्रेस ने 80 में से 42 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल कर लिया है। BJP के 27, निर्दलीयों के 10 और RLP का एक पार्षद जीता है। संख्या के लिहाज से कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए किसी बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं है। फिर भी स्थानीय स्तर पर BJP की ओर से बोर्ड गठन को लेकर सक्रियता की खबरें सामने आई हैं। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से BJP और उसके संभावित सहयोगियों की संख्या बहुमत तक नहीं पहुंचती, इसलिए यहां की स्थिति बाकी हंग असेंबली वाले निकायों से अलग है।

दूसरी तरफ नागौर की रियांबड़ी जैसी छोटी नगर पालिकाओं में भी एक-एक पार्षद की कीमत बढ़ गई है। जहां बहुमत से सिर्फ एक सीट कम हो, वहां चुनाव के बाद सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि वह एक सीट किसके साथ जाएगी। बड़े नगर निगमों में जहां दर्जनों पार्षदों का गणित बैठाना पड़ता है, वहीं छोटी पालिकाओं में एक पार्षद भी पूरा बोर्ड बनवा सकता है।

इसी जोड़तोड़ के बीच कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने BJP पर निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में करने और खरीद-फरोख्त की कोशिश के आरोप लगाए हैं। डोटासरा का कहना है कि BJP धनबल के जरिए बोर्ड बनाने की कोशिश कर रही है। BJP की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया है और पार्टी नेताओं ने कहा है कि कई पार्षद विचारधारा के आधार पर BJP के साथ आना चाहते हैं। यानी दोनों दलों की तरफ से कहानी अपनी-अपनी है, लेकिन जमीन पर दोनों की नजर उन्हीं पार्षदों पर है जो अभी किसी एक खेमे में पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहे।

जयपुर में भी चुनाव के बाद BJP और कांग्रेस के पार्षदों को रिसॉर्ट में रखने की खबरें सामने आई थीं, जिसे संभावित हॉर्स ट्रेडिंग से बचाव की कवायद के तौर पर देखा गया। यानी राजस्थान की निकाय राजनीति में अब चुनाव प्रचार खत्म हो चुका है, लेकिन “किसके साथ कौन?” वाला सवाल अभी बाकी है।

आने वाले दिनों में बोर्ड गठन का यह खेल और दिलचस्प हो सकता है। जिन शहरों में स्पष्ट बहुमत है, वहां तस्वीर अपेक्षाकृत सीधी है, लेकिन अजमेर, जोधपुर, पाली, अलवर और खैरथल जैसे निकायों में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। चुनाव में जनता ने पार्षद चुन दिए हैं; अब इन पार्षदों को अपने साथ जोड़ने की राजनीति शुरू हो गई है। मतदान की मशीनें बंद हो चुकी हैं, लेकिन बोर्ड गठन का कैलकुलेटर अभी चालू है।

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