Jaipur : राजस्थान में पानी की राजनीति सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं है। अब उत्तर भारत की एक बड़ी बहुउद्देश्यीय परियोजना पर हुए समझौते ने राजस्थान के लिए पानी के मोर्चे पर नया रास्ता खोल दिया है। किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर राजस्थान समेत छह राज्यों ने 15 सितंबर को समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। नई दिल्ली में हुए इस समझौते के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल मौजूद रहे, जबकि राजस्थान की ओर से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने हस्ताक्षर किए।
किशाऊ परियोजना कोई नई फाइल नहीं है, बल्कि दशकों से सरकारी मेजों और राज्यों के बीच पानी के हिसाब-किताब में उलझी हुई योजना है। पानी का बंटवारा, लागत और अलग-अलग राज्यों के हित ऐसे मुद्दे रहे, जिन पर सहमति बनाना आसान नहीं था। इस बार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली एक साथ परियोजना को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। जून 2026 में सहमति बनने के बाद सितंबर में औपचारिक समझौते तक पहुंचना इस परियोजना के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है।
परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। समझौते के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा के पास 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाना है। इसकी जल संग्रहण क्षमता करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर बताई गई है। परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया है, ऐसे में इसका सबसे बड़ा वित्तीय भार केंद्र सरकार उठाएगी।
यही वह हिस्सा है जो राज्यों के लिए इस परियोजना को खास बनाता है। केंद्र सरकार परियोजना के जल घटक की करीब 90 फीसदी लागत केंद्रीय सहायता के तौर पर वहन करेगी, जबकि बाकी 10 फीसदी राशि छह भागीदार राज्यों के बीच तय व्यवस्था के अनुसार साझा की जाएगी। यानी वर्षों से लागत और हिस्सेदारी को लेकर चल रही माथापच्ची में अब एक स्पष्ट वित्तीय ढांचा सामने आया है।
राजस्थान के लिए परियोजना का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि राज्य लगातार जल संकट वाले इलाकों में अतिरिक्त जल स्रोत तलाश रहा है। केंद्र की जानकारी के मुताबिक किशाऊ परियोजना में हिमाचल प्रदेश के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को देने पर भी सहमति बनी है। इसके बदले परियोजना के पावर कंपोनेंट में हिमाचल प्रदेश के हिस्से की लागत को साझा करने की व्यवस्था की गई है। इसी समझौते ने राज्यों के बीच लंबे समय से अटके एक अहम मुद्दे को सुलझाने में भूमिका निभाई है।
राजस्थान में इस परियोजना को लेकर सबसे ज्यादा उम्मीद शेखावाटी जैसे पानी की कमी वाले इलाकों को लेकर है। हालांकि राजस्थान के लिए 124 MCM पानी के आवंटन का आंकड़ा अभी उपलब्ध केंद्रीय 15 सितंबर की आधिकारिक रिलीज में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है, इसलिए इस आंकड़े को फिलहाल संभावित/रिपोर्टेड आंकड़े के तौर पर ही देखना बेहतर होगा। परियोजना से राजस्थान को मिलने वाला वास्तविक हिस्सा संबंधित जल बंटवारे और कार्यान्वयन व्यवस्था के अनुसार स्पष्ट होगा।
किशाऊ परियोजना का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं रहने वाला है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इससे करीब 97 हजार हेक्टेयर भूमि में सिंचाई क्षमता विकसित होगी और लगभग 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है। इसके अलावा परियोजना को यमुना में नियंत्रित और स्वच्छ जल प्रवाह बढ़ाने तथा नदी के पुनर्जीवन से भी जोड़ा गया है।
राजस्थान के संदर्भ में यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर यमुना बेसिन से जुड़े पानी को राजस्थान तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग परियोजनाओं पर काम चल रहा है। जून में राजस्थान और हरियाणा के बीच पश्चिमी यमुना नहर से भूमिगत पाइपलाइनों के जरिए राजस्थान के हिस्से का पानी पहुंचाने को लेकर भी समझौता हुआ था। उस परियोजना का उद्देश्य राज्य के हिस्से के करीब 580 MCM पानी को राजस्थान तक पहुंचाना है।
अब किशाऊ परियोजना के सामने अगला बड़ा पड़ाव निर्माण शुरू करना है। छह राज्यों के हस्ताक्षर के बाद परियोजना को आगे की जरूरी मंजूरियों और प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। जून में केंद्र ने साफ किया था कि राज्यों की सहमति के बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए रखा जाएगा। यानी कागज पर चार दशक पुरानी कहानी ने जरूर नया अध्याय शुरू कर दिया है, लेकिन बांध बनने और पानी जमीन तक पहुंचने के बीच अभी कई प्रशासनिक और तकनीकी पड़ाव बाकी हैं।
फिलहाल इतना जरूर है कि किशाऊ परियोजना पर छह राज्यों की सहमति ने लंबे समय से अटकी योजना को आगे बढ़ने का रास्ता दे दिया है। राजस्थान के लिए इसका असली फायदा तब सामने आएगा जब परियोजना जमीन पर आकार लेगी और पानी का आवंटित हिस्सा वास्तव में राज्य तक पहुंचेगा। समझौता हो गया है, अब असली परीक्षा कागज से निकलकर बांध और पानी तक पहुंचने की है।