Jaipur : UPI को कभी कैश की झंझट से मुक्ति का सबसे आसान रास्ता बताया गया था, लेकिन अब बड़े डिजिटल भुगतान के साथ कारोबारियों की जेब का गणित भी बदलने की तैयारी है। 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से ज्यादा के कुछ कारोबारी UPI भुगतान पर 0.4 फीसदी Merchant Discount Rate (MDR) लागू होने की बात सामने आई है। खबर राजस्थान के व्यापारियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बड़े बाजारों से लेकर छोटे कारोबार तक डिजिटल भुगतान रोजमर्रा के लेनदेन का हिस्सा बन चुका है। कारोबारियों की चिंता है कि जब मार्जिन पहले ही नाप-तौलकर रखा जाता है, तब हर बड़े डिजिटल भुगतान पर लगने वाली छोटी-सी कटौती महीने के आखिर में अच्छी-खासी रकम बन सकती है।
नई व्यवस्था के मुताबिक ₹2,000 से अधिक के पात्र Person-to-Merchant यानी P2M UPI ट्रांजैक्शन पर 0.4 फीसदी MDR लगेगा और इसकी अधिकतम सीमा ₹300 होगी। ₹2,000 तक के UPI भुगतान और Person-to-Person यानी P2P ट्रांजैक्शन इस दायरे से बाहर रहेंगे। मसलन, अगर किसी ग्राहक ने दुकान पर ₹5,000 का पात्र UPI भुगतान किया तो MDR की गणना व्यापारी पक्ष पर होगी। यानी ग्राहक के मोबाइल पर पेमेंट करते समय ऐसा कोई नया मीटर नहीं चलेगा जो ₹5,000 देखते ही अलग से 0.4 फीसदी काट ले। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है कि व्यापारी की जेब से निकलने वाली रकम आखिर जाएगी कहां से?
राजस्थान के व्यापारिक संगठनों का कहना है कि ज्यादातर कारोबारियों का मार्जिन पहले से ही बहुत बड़ा नहीं है। Federation of Rajasthan Trade and Industry के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल ने अतिरिक्त लागत को लेकर चिंता जताते हुए सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। कारोबारियों का तर्क है कि एक-दो ट्रांजैक्शन पर रकम भले छोटी दिखाई दे, लेकिन अगर किसी दुकान पर हर दिन कई बड़े UPI भुगतान आते हैं तो महीने के अंत तक यही छोटी रकम हिसाब-किताब में बड़ा कॉलम बना सकती है। कारोबारी भाषा में कहें तो ‘डिजिटल इंडिया’ का भुगतान तो कैशलेस होगा, लेकिन खर्च का हिसाब शायद उतना कैशलेस नहीं रहेगा।
सबसे दिलचस्प पेंच यह है कि व्यापारी ग्राहक के बिल में मनमाने ढंग से अलग से ‘UPI चार्ज’ जोड़कर इस लागत की भरपाई नहीं कर सकता। ऐसे में कारोबारी के पास अतिरिक्त खर्च खुद उठाने या फिर अपनी कुल लागत में उसे समायोजित करने का रास्ता बचता है। दूसरे शब्दों में, ग्राहक को बिल पर अलग से UPI शुल्क दिखाई न दे, लेकिन अगर व्यापारी अपनी कीमत तय करते समय इस खर्च को जोड़ता है तो उसका असर किसी न किसी रूप में कीमत पर पहुंच सकता है। यही वह बिंदु है जहां व्यापारियों की चिंता सिर्फ भुगतान शुल्क तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि बाजार में कीमतों और मार्जिन के पूरे गणित से जुड़ जाती है।
इसका असर उन कारोबारों में ज्यादा महसूस हो सकता है जहां एक बार में बड़ी रकम का डिजिटल भुगतान आम है। ज्वेलरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, फर्नीचर, ऑटोमोबाइल, गारमेंट, होटल, रेस्टोरेंट, पर्यटन और हस्तशिल्प जैसे सेक्टर में ₹2,000 से ऊपर के भुगतान सामान्य हैं। दूसरी तरफ किराना और छोटे पड़ोस के दुकानदारों पर असर अपेक्षाकृत सीमित रह सकता है, क्योंकि उनके कई UPI लेनदेन इस सीमा से नीचे होते हैं। हालांकि, जिस छोटे दुकानदार के पास महीने में लगातार बड़े डिजिटल भुगतान आते हैं, उसके लिए 0.4 फीसदी भी सिर्फ प्रतिशत नहीं, महीने के अंत में पूरा हिसाब मांगने वाली रकम हो सकती है।
CAIT राजस्थान के महासचिव हेमंत प्रभाकर ने आशंका जताई है कि नए शुल्क से कुछ ग्राहक बड़े भुगतान के लिए नकद या दूसरे भुगतान माध्यमों की तरफ लौट सकते हैं। हालांकि UPI की आदत इतनी तेजी से बनी है कि ग्राहक को दोबारा नोट गिनने के लिए मनाना आसान होगा या नहीं, यह अलग सवाल है। फिर भी व्यापारियों की चिंता यह है कि अगर बड़े डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त लागत बढ़ती है तो भुगतान के तरीके को लेकर ग्राहक और कारोबारी दोनों दोबारा गणित लगाने लगेंगे।
जयपुर के बाजारों में तो UPI अब दुकान की रोजमर्रा की व्यवस्था का हिस्सा है। जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अजमेर जैसे शहरों में भी डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल व्यापक हो चुका है। ऐसे में नई व्यवस्था का असर हर बाजार में एक जैसा नहीं होगा। किसी व्यापारी के लिए यह मामूली लागत हो सकती है तो किसी दूसरे के लिए महीने के हिसाब में एक और खर्च, जिसे पहले कोई कॉलम ही नहीं दिया गया था। जयपुर के व्यापारिक संगठनों की ओर से भी मुफ्त UPI भुगतान व्यवस्था जारी रखने की मांग की गई है और छोटे एवं मध्यम कारोबारों पर संभावित दबाव को लेकर चिंता जताई गई है।
फिलहाल सबसे जरूरी बात यह समझना है कि ₹2,000 से ज्यादा के हर UPI भुगतान पर ग्राहक से सीधे 0.4 फीसदी शुल्क वसूला जाएगा, ऐसा नहीं है। MDR पात्र कारोबारी लेनदेन से जुड़ा शुल्क है। लेकिन कारोबारी इस लागत को अपने कारोबार में कैसे समायोजित करते हैं, यही आगे की तस्वीर तय करेगा। आखिर बाजार में खर्च का एक पुराना नियम है—जो लागत सीधे बिल में नहीं दिखती, वह अक्सर किसी न किसी दूसरे खाने में जगह बना लेती है। अब UPI के बड़े भुगतान में यही अतिरिक्त लागत किस खाने में जाती है, इस पर राजस्थान के कारोबारी नजर रखे हुए हैं।