राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव न कराए जाने के मामले पर भाजपा सरकार पर खुला हमला बोलते हुए कहा है कि यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि संविधान के उल्लंघन जैसी स्थिति बन चुकी है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जब सरकार और चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट व राजस्थान हाईकोर्ट के निर्देशों की अवमानना कर रहे हैं, तो इसे संविधान के ब्रेकडाउन की श्रेणी में रखना चाहिए और ऐसी सरकार के सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता। इसी वजह से गहलोत का विचार है कि राजस्थान सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए, क्योंकि जो सरकार संवैधानिक संस्थाओं, राज्यपाल और न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह न हो और जानबूझकर चुनाव समय पर नहीं करवाए, वह संविधान की मूल भावना को ठेस पहुंचा रही है।
गहलोत का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में 15 अप्रैल तक पंचायत व नगर निकाय चुनाव संपन्न कराने के आदेश दिए हैं, लेकिन केवल राजनीतिक फायदे के चलते राज्य सरकार और चुनाव आयोग इन आदेशों को टालने, लटकाने और अनदेखा करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब सरकार अदालतों के निर्णय के आगे नहीं झुकती तो यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने याद दिलाया कि जब उनकी सरकार के समय कर्मचारी संघ की हड़ताल चल रही थी, तब उन्होंने चुनाव टालने की सिफारिश भी की थी, लेकिन केन्द्रीय अधिकारियों ने इसे न मानते हुए चुनाव पूरे करवा दिए; आज की स्थिति में भी कोई न कोई रास्ता निकाला जा सकता है, लेकिन सरकार की इच्छाशक्ति ही लोकतंत्र के खिलाफ दिखाई दे रही है।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री ने इस मामले में राज्यपाल, केंद्र सरकार और राष्ट्रपति के प्रति भी नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि वर्तमान में न तो राज्यपाल जोरदार बयान दे पा रहे हैं और न ही केंद्रीय सरकार स्पष्ट रूप से राजस्थान सरकार को निर्देश दे रही है। ऐसे में उन्होंने राष्ट्रपति से स्पष्ट रूप से आह्वान किया है कि वे आगे आकर राज्यपाल के माध्यम से संविधान व अदालतों के आदेशों की पाबंदी सुनिश्चित करें और यह देखें कि पंचायत व निकाय चुनाव निर्धारित समय पर हों, भले ही किसी भी औचित्य के सहारे उन्हें टालने की कोशिश क्यों न की जा रही हो। गहलोत का यह भी दावा है कि जो सरकार चुनावों से इतनी घबराई हुई है कि उन्हें जानबूझकर अटकाए रखा जा रहा है, शायद उसे डर है कि जनता के फैसले से उसकी जनआधार खत्म हो जाएगा या उसकी राजनीतिक तस्वीर साफ हो जाएगी, इसलिए चुनाव नहीं होने दिए जा रहे हैं।
इसी धारणा के आधार पर गहलोत ने राजस्थान सरकार को “बर्खास्त करने लायक” केस बताया है, क्योंकि जब सरकार संविधान के नियमों, अदालतों के आदेशों और राज्यपाल के दायरे का सम्मान नहीं करती, तो वह औथॉरिटी के नाम पर लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। उन्होंने राजनीतिक पार्टनरशिप की बात भी उठाई, कि आज जो राज्य सरकार चल रही है, उसका पीछे नेशनल लेवल पर एक बड़ा राजनीतिक इंजन बैठा है, जो अपने दल के हित में यह नहीं चाहेगा कि उसी दल की राज्य सरकार बर्खास्त हो, इसलिए आंतरिक राजनीतिक दबावों के चलते राज्य सरकार के खिलाफ ठोस संवैधानिक कार्रवाई नहीं की जा रही। इस बातचीत के जरिए गहलोत स्थानीय स्वशासन की जड़ों को बचाने, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनर्स्थापित कराने और राजस्थान की न्यायपालिका, राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिका को बल देने का सीधा संदेश दे रहे हैं।
