मुंबई के वाडिया चिल्ड्रन हॉस्पिटल में एक बच्चे की मौत का मामला तूल पकड़ रहा है। बच्चे की मां ने अस्पताल पर लापरवाही, जबरन ऑपरेशन और इच्छामृत्यु का दबाव डालने के गंभीर आरोप लगाए हैं। मां के अनुसार, वरद हॉस्पिटल से रेफर होने के बाद बच्चे को टीबी पॉजिटिव बताया गया, लेकिन उचित इलाज के बजाय सर्जरी और वेंटिलेटर पर डाल दिया गया, जिससे बच्चे की हालत बिगड़ती चली गई।
मां की शिकायत के मुताबिक, बच्चा चार दिन पहले वरद हॉस्पिटल में एडमिट था। वहां एमआरआई में छाती में भराव या टीबी के लक्षण दिखे, इसलिए वाडिया रेफर किया गया। वाडिया पहुंचते ही सोमवार को बच्चे का परीक्षण किया गया, पैरासिटामोल दिया और घर भेज दिया। अगले दिन बलगम टेस्ट में टीबी पॉजिटिव आया। डॉक्टरों ने एडमिट न करते हुए गोली-औषध लिखकर घर भेज दिया, कहते रहे कि बच्चा ठीक है। सात दिन बाद बुखार आने पर फिर वाडिया ले गए। बच्चा रास्ते में हंसता-खेलता दो बोतल दूध पी चुका था, लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों के हाथ में देते ही बेहोश हो गया। 13 दिनों तक यही हाल रहा।
मां ने बताया कि डॉक्टरों ने ऑपरेशन के लिए दबाव डाला। बोले, “ऑपरेशन करो वरना बच्चा मर जाएगा।” पूछने पर कहा, तीन टांके लगेंगे, छोटा सा है। लेकिन डोकरी, पेट और गले की तीन सर्जरी कीं। तीसरे दिन फिर गले की सर्जरी। चौथे दिन महिलाएं टालू पर हाथ फेरकर बोलीं, “नरम लग रहा, पानी भर गया।” टालू में इंजेक्शन देकर खून निकाला, दो-तीन दिन लगातार। पांचवें दिन बोले, पेट में हवा भरी है, छाती में पाइप डालना जरूरी। सिग्नेचर न करने पर जबरदस्ती की। उसके बाद वेंटिलेटर पर तीन बार स्पोर्ट दो बार ऑक्सीजन बोतल खत्म। डॉक्टर बोले, “इम्यूनिटी खत्म, गारंटी नहीं।” घर ले जाने की इजाजत न दी, गेट तक भी नहीं।
रिया मैडम ने लेटर लाकर साइन मंगवाया, जो समझ न आया तो फोटो लेने लगीं तो छीन लिया। आश्वासन दिया कि प्रयास कर रहे, लेकिन बार-बार बोले, “फैसला लो, बचेगा तो बोल-चल नहीं पाएगा, फायदा नहीं।” आखिरकार लेटर रखा, “इच्छा मृत्यु दो, त्रास न दो।” रिया मैडम ने तीन बार कहा। बच्चा दो दिन बाद बंद हो गया। मौत के बाद एक महिला बोली, “कुछ मांग है? बाहर जाकर एक्शन लोगी?” क्लीन करते दो सिक्योरिटी बाहर खींचीं। मां ने देखा, 12 टांके थे छाती का पाइप सड़ा हुआ, गले से खून बह रहा। बच्चा बोल न सके ऐसी हालत।
यह मामला बाल चिकित्सा में लापरवाही का गंभीर उदाहरण है। टीबी जैसे रोग में लंबा दवा कोर्स जरूरी, सर्जरी आखिरी विकल्प। मां ने हॉस्पिटल प्रबंधन, डॉक्टरों पर एफआईआर की मांग की। हिमाचल बाल अधिकार आयोग जैसी संस्थाएं ऐसे मामलों में जांच कर सकती हैं। स्वास्थ्य विभाग को तत्काल जांच करनी चाहिए। परिवार न्याय की मांग कर रहा है।
