निकाय चुनाव के बाद BJP का अगला टारगेट पंचायत, संभाग प्रभारियों से मांगी गई हार-जीत की पूरी कुंडली

News Desk

जयपुर। राजस्थान में निकाय चुनाव का शहरी अध्याय अभी पूरी तरह बंद भी नहीं हुआ कि भाजपा ने गांवों की ओर सियासी नजरें घुमा दी हैं। पार्टी ने अब आगामी पंचायतीराज चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। रविवार को जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश मुख्यालय में हुई बैठक में निकाय चुनाव के नतीजों की समीक्षा के साथ पंचायत चुनाव की रणनीति पर मंथन हुआ। संभाग प्रभारियों से कहा गया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों की जीत-हार की पूरी रिपोर्ट तैयार करें, ताकि अगले चुनाव में संगठन कहां मजबूत रहा और कहां समीकरण फिसले, इसका हिसाब सामने आ सके।

बैठक की कमान प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ और राष्ट्रीय महामंत्री हरीश द्विवेदी ने संभाली। चर्चा सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं रही कि कितनी सीटें आईं और कितनी हाथ से निकल गईं। संगठन को स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन की पड़ताल करने, अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ बगावत, निर्दलीयों की जीत और संगठन की भूमिका जैसे पहलुओं को रिपोर्ट में शामिल करने को कहा गया है। यानी अब सिर्फ रिजल्ट शीट नहीं, चुनाव की पूरी ‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट’ तैयार होगी।

निकाय चुनाव में निर्दलीयों ने कई जगह समीकरण बिगाड़े और कुछ जगह बोर्ड गठन तक उनकी भूमिका अहम बनी। भाजपा की समीक्षा में यह भी देखा जाएगा कि पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के सामने निर्दलीय क्यों मजबूत हुए और किन स्थानीय कारणों ने मतदाताओं का रुख बदला। चुनाव के दौरान उठे मुद्दों के असर का भी आकलन किया जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, UGC के इक्विटी नियमों को लेकर उठे विवाद और उसके राजनीतिक प्रभाव को भी समीक्षा के बिंदुओं में शामिल किया गया।

निकाय चुनाव के आंकड़े भी इस समीक्षा की पृष्ठभूमि में हैं। 309 शहरी निकायों के चुनाव में भाजपा 148 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही, जबकि कांग्रेस 104 निकायों में आगे रही; कई निकायों में निर्दलीयों ने भी अहम भूमिका निभाई। ऐसे में भाजपा की नजर अब इस बात पर है कि शहरी चुनाव में मिली बढ़त को ग्रामीण संगठन तक कैसे ले जाया जाए—क्योंकि पंचायत का मैदान वार्ड से बड़ा और स्थानीय समीकरणों के लिहाज से अलग होता है।

बैठक के बाद मदन राठौड़ ने कहा कि भाजपा पंचायत चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने प्रदेश में 70 प्रतिशत से अधिक जनता के भाजपा के साथ होने का दावा भी किया। यह राठौड़ का राजनीतिक दावा है, न कि स्वतंत्र चुनावी आंकड़ा। कांग्रेस की ओर से भाजपा पार्षदों की कथित क्रॉस वोटिंग और अन्य आरोपों को लेकर चल रही बयानबाजी पर भी उन्होंने प्रतिक्रिया दी।

हरीश द्विवेदी ने निकाय चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के लिए राजस्थान की जनता का आभार जताया। उन्होंने कहा कि पार्षद चुनाव में 40-42 प्रतिशत वोट मिलना अच्छा समर्थन माना जाता है और उनके अनुसार भाजपा को जनता का भरपूर समर्थन मिला। उन्होंने निकाय चुनाव के परिणामों को भजनलाल शर्मा सरकार की नीतियों से जोड़ते हुए इसे सरकार के कामकाज के समर्थन के तौर पर पेश किया। ये भी पार्टी नेतृत्व की राजनीतिक व्याख्या है।

बैठक में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने भी निकाय चुनाव के नतीजों को भाजपा के पक्ष में जनमत और अंडरकरंट के तौर पर पेश किया। उन्होंने राज्य की करीब 37 प्रतिशत आबादी के शहरी क्षेत्रों में रहने का हवाला देते हुए निकाय चुनाव के नतीजों को व्यापक राजनीतिक संकेत बताया। हालांकि, निकाय चुनाव के शहरी नतीजों को सीधे पंचायत चुनाव के संभावित परिणाम से जोड़ना अलग बात होगी, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में उम्मीदवार, जातीय-सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे चुनावी गणित बदल सकते हैं।

बैठक में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के भी शामिल होने की चर्चा थी, लेकिन वे व्यक्तिगत रूप से प्रदेश मुख्यालय नहीं पहुंचे। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, मुख्यमंत्री वर्चुअल माध्यम से बैठक से जुड़े। संगठन महामंत्री अजेय कुमार समेत पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारी और संभाग प्रभारी बैठक में मौजूद रहे।

अब भाजपा का फोकस निकाय चुनाव के आंकड़ों को पंचायत चुनाव की तैयारी में इस्तेमाल करने पर है। जीत वाले इलाकों में कौन-सी रणनीति चली, हार वाले क्षेत्रों में कहां चूक हुई, बागियों और निर्दलीयों ने कितना असर डाला और स्थानीय संगठन की पकड़ कहां कमजोर रही—इन सवालों के जवाब संभाग प्रभारियों की रिपोर्ट से तलाशे जाएंगे।

पंचायत चुनावों के लिहाज से यह कवायद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरक्षण प्रक्रिया की तारीखें भी आगे बढ़ रही हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण लॉटरी अब 23 और 24 सितंबर को प्रस्तावित है। ऐसे में भाजपा के पास निकाय चुनाव की समीक्षा और ग्रामीण चुनाव की तैयारियों के बीच ज्यादा समय नहीं है।

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