बघेल के बाद पायलट को जिम्मेदारी… क्या भाजपा से ‘समझौते’ की पुरानी चर्चाएं कांग्रेस के लिए फिर बनीं चुनौती?
नई दिल्ली/चंडीगढ़। पंजाब कांग्रेस में बड़ा बदलाव हुआ है। सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद पार्टी के भीतर और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। एक तरफ भूपेश बघेल को पंजाब की जिम्मेदारी से हटाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ पायलट की नई भूमिका ने 2020 के राजस्थान सियासी संकट की पुरानी यादें ताजा कर दी हैं।
राजनीतिक चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि भूपेश बघेल को पंजाब से हटाने के पीछे भाजपा के साथ कथित ‘समझौते’ को लेकर कांग्रेस की आशंका एक वजह हो सकती है। हालांकि, इस दावे की सार्वजनिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है।
बघेल के बेटे चेतन्य बघेल का नाम शराब घोटाले से जुड़े मामले में सामने आया था और वे जेल भी गए थे। मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या इस पूरे घटनाक्रम का पंजाब की राजनीति में बघेल की भूमिका पर कोई असर पड़ा?
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल सचिन पायलट को लेकर उठ रहा है।
पायलट की जिम्मेदारी और 2020 का राजस्थान संकट
सचिन पायलट को पंजाब की कमान मिलते ही राजस्थान के 2020 के राजनीतिक संकट की चर्चा फिर शुरू हो गई है। उस समय पायलट और तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच खुलकर राजनीतिक टकराव हुआ था।
गहलोत ने कई मौकों पर आरोप लगाया था कि भाजपा कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त की कोशिश कर रही थी। पायलट खेमे के विधायकों को कथित तौर पर 20 से 25 करोड़ रुपये तक की पेशकश किए जाने के आरोप भी लगाए गए थे। दिल्ली से जुड़े सूत्रों ने बताया कि उस वक़्त भाजपा ने पायलट खेमे के विधायकों को बकायदा चैक से पेमेंट दिया था। इसी दौर में पायलट के भाजपा के साथ कथित संपर्कों को लेकर भी राजनीतिक आरोप लगाए गए।
धर्मेंद्र प्रधान का नाम फिर क्यों चर्चा में?
मानेसर प्रकरण के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में आया था। अब पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके आलोचक इस पुराने प्रकरण को फिर उठा रहे हैं।
सवाल यह भी किया जा रहा है कि पिछले दिनों के राजनीतिक घटनाक्रमों में पायलट ने धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। राहुल गाँधी और राजस्थान कांग्रेस द्वारा किये गए धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों से पायलट ने दुरी बनानकर रखी, यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में एक सवाल लगातार घूम रहा है
क्या पायलट और भाजपा के बीच आज भी कोई राजनीतिक समझौता है?
हालांकि, किसी नेता का किसी विरोधी नेता के खिलाफ बयान नहीं देना या किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं होना किसी ‘डील’ का प्रमाण तो नहीं माना जा सकता लेकिन राजनीती गलियारों में चर्चाऐं है और सवाल भी उठ रहे है कि पायलट की आखिर भाजपा से किस प्रकार की डील हो सकती है ? ऐसी आशंकाएं है वहीँ 2020 के विवादों के कारण इस तरह के सवाल राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल—‘गारंटी’ क्या है?
राजनीतिक बहस में सबसे तीखा सवाल यही उठ रहा है—
अगर 2020 में भाजपा के साथ किसी समझौते के आरोप लगाए गए थे, तो आज कांग्रेस के पास क्या गारंटी है कि पंजाब में पायलट ऐसा कुछ नहीं करेंगे ? पंजाब में पायलट की नियुक्ति के साथ मानेसर का पुराना अध्याय फिर राजनीतिक सवाल बन गया है।
पायलट अब पंजाब में कांग्रेस को मजबूत करेंगे या 2020 के विवादों का साया उनके साथ चलता रहेगा?
इसका जवाब आने वाले दिनों में पायलट के फैसले, उनके राजनीतिक रुख और पंजाब में कांग्रेस के प्रदर्शन से ही मिलेगा।
यह खबर सूत्रों के हवाले से और चर्चाओं के आधार पर लिखी गयी है, कुछ आरोप जो सार्वजनिक थे उसका भी ज़िक्र है