राजस्थान हाईकोर्ट के बड़े निर्देश: जघन्य अपराधों के आरोपी किशोरों के आकलन में बदलाव, केयर लीवर्स को 1% आरक्षण

News Desk

Jaipur : राजस्थान हाईकोर्ट ने किशोर न्याय व्यवस्था और बाल देखभाल संस्थानों से बाहर निकलने वाले युवाओं यानी केयर लीवर्स के लिए कई अहम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने जघन्य अपराधों के आरोपी किशोरों के प्रारंभिक आकलन की प्रक्रिया को अधिक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार देने पर जोर दिया है। इसके साथ ही केयर लीवर्स के लिए सरकारी शिक्षा और रोजगार में 1 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की नीति बनाने के निर्देश केंद्र और राज्य सरकार को दिए हैं।

कोर्ट ने कहा है कि यह नीति सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में दाखिले के साथ सरकारी नौकरियों और संविदा नियुक्तियों पर भी लागू की जाए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को 12 सप्ताह के भीतर नीति अधिसूचित करने को कहा गया है।

हाईकोर्ट के ये निर्देश एक POCSO मामले की सुनवाई के दौरान सामने आए, जिसमें आरोपी को किशोर मानने से इनकार करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी। मामले में आरोपी की उम्र को लेकर शैक्षणिक दस्तावेजों में विरोधाभास सामने आया। कक्षा 10 की मार्कशीट में जन्मतिथि 1 जुलाई 2006 दर्ज थी, जबकि 2007 में उसके पिता की ओर से भरे गए कक्षा 1 के प्रवेश फॉर्म में जन्मतिथि 14 नवंबर 2003 दर्ज की गई थी।

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि जब शैक्षणिक दस्तावेजों में जन्मतिथि को लेकर विरोधाभास हो, तो सरकारी प्राथमिक विद्यालय के रजिस्टर में दर्ज सबसे पुरानी प्रविष्टि को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। इस तरह अदालत ने उम्र निर्धारण के मामले में उपलब्ध पुराने और आधिकारिक रिकॉर्ड की अहमियत को रेखांकित किया।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 15 के तहत जघन्य अपराधों के आरोपी किशोरों के प्रारंभिक आकलन की प्रक्रिया पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि कई मामलों में यह प्रक्रिया केवल एक औपचारिक रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित रह जाती है, जबकि किशोर की मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्थिति का समुचित मूल्यांकन जरूरी है।

इसी को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जिला स्तर पर विशेषज्ञ पैनल गठित करने का निर्देश दिया है। इन पैनलों में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक और चाइल्ड साइकोलॉजी विशेषज्ञ शामिल होंगे। पैनलों का गठन छह सप्ताह के भीतर करने को कहा गया है।

कोर्ट के निर्देश के मुताबिक प्रारंभिक आकलन के दौरान किशोर के साथ कम से कम तीन सत्र किए जाने चाहिए। इसके अलावा उसके माता-पिता या अभिभावक और एक शिक्षक से भी बातचीत की जाएगी। मूल्यांकन में मान्यता प्राप्त मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को शामिल करना होगा और इसके लिए NIMHANS की गाइडलाइंस के अनुरूप परीक्षणों का इस्तेमाल करने के निर्देश दिए गए हैं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्धारित प्रारूप और प्रक्रिया का पालन किए बिना तैयार की गई आकलन रिपोर्ट को Juvenile Justice Board स्वीकार नहीं करेगा। यानी प्रारंभिक आकलन अब केवल कागजी औपचारिकता न रहकर किशोर की वास्तविक परिस्थितियों और मनोवैज्ञानिक स्थिति को समझने की प्रक्रिया के रूप में किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने बाल देखभाल संस्थानों से बाहर निकलने वाले युवाओं यानी केयर लीवर्स के पुनर्वास को लेकर भी विस्तृत दिशा-निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से 1 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की नीति बनाने को कहा है। यह आरक्षण सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों में दाखिले के अलावा सरकारी नौकरियों और संविदा नियुक्तियों में लागू करने की बात कही गई है।

जब तक यह आरक्षण नीति अधिसूचित नहीं हो जाती, तब तक केयर लीवर्स को सरकारी भर्तियों में पांच साल की आयु सीमा में छूट देने के साथ आवेदन और परीक्षा शुल्क से राहत देने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने आवास, स्वरोजगार और स्टार्टअप शुरू करने के लिए पांच लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता और ब्याज मुक्त ऋण की व्यवस्था करने पर भी जोर दिया है।

शिक्षा के मोर्चे पर भी अदालत ने केयर लीवर्स के लिए कई प्रावधान सुझाए हैं। सरकारी संस्थानों में स्नातक स्तर तक मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करने के साथ उच्च शिक्षा के लिए कम से कम 4,000 रुपये मासिक छात्रवृत्ति देने की बात कही गई है। प्रोफेशनल कोर्स करने वाले युवाओं के लिए यह राशि कम से कम 6,000 रुपये मासिक रखने और हॉस्टल सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।

अदालत ने पुनर्वास की प्रक्रिया को 18 साल की उम्र के बाद शुरू करने के बजाय उससे पहले तैयार करने पर भी जोर दिया। बाल देखभाल संस्थानों को बच्चे के 17 साल 6 महीने की उम्र पूरी होने तक उसके पहचान संबंधी दस्तावेज सुनिश्चित करने होंगे। संस्थान से बाहर निकलते समय हर केयर लीवर के पास आफ्टरकेयर आइडेंटिटी कार्ड होना चाहिए।

इसके अलावा 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले बच्चों के लिए व्यक्तिगत पुनर्वास योजना तैयार करने के निर्देश भी दिए गए हैं, ताकि संस्थान से बाहर निकलने के बाद उन्हें शिक्षा, रोजगार, आवास और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए अचानक पूरी तरह अकेला न छोड़ना पड़े।

हाईकोर्ट के इन निर्देशों का दायरा दो अहम पहलुओं को जोड़ता है। एक तरफ जघन्य अपराधों के आरोपी किशोरों के मामले में उम्र निर्धारण और मनोवैज्ञानिक आकलन की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और विशेषज्ञ-आधारित बनाने पर जोर है, तो दूसरी तरफ बाल देखभाल संस्थानों से निकलने वाले युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास की ठोस व्यवस्था विकसित करने की दिशा दिखाई गई है।

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