जयपुर। राजस्थान में निकाय चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां अब निर्णायक दौर में पहुंच गई हैं। प्रदेश के 309 नगरीय निकायों के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस ने अपने-अपने प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया पूरी कर ली है। हालांकि, दोनों प्रमुख दलों ने अभी तक सभी उम्मीदवारों की अधिकृत सूची सार्वजनिक नहीं की है। कई दावेदारों को व्यक्तिगत रूप से टिकट मिलने की सूचना दिए जाने की बात सामने आ रही है। वहीं, पार्टी नेतृत्व सूची जारी करने से पहले संभावित बगावत और भीतरघात को नियंत्रित करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
राजस्थान में होने वाले निकाय चुनाव दोनों प्रमुख दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। लंबे समय से चुनाव की तैयारी कर रहे दावेदार अब अंतिम सूची का इंतजार कर रहे हैं। कई वार्डों में एक ही पार्टी से टिकट के लिए कई मजबूत दावेदार सामने आए हैं। ऐसे में उम्मीदवार तय करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ बनाए रखने की है, जिन्हें टिकट नहीं मिल पाया है।
राज्य में इस बार 309 नगरीय निकायों में चुनाव होने हैं। इनमें 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगर पालिकाएं शामिल हैं। इन निकायों के कुल 10,245 वार्डों में पार्षद चुने जाएंगे। इतने बड़े स्तर पर होने वाले चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन दोनों दलों के लिए लंबी प्रक्रिया रहा है। स्थानीय राजनीतिक समीकरण, सामाजिक और जातीय संतुलन, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, संगठन में सक्रियता और जीतने की संभावना जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर नाम तय किए गए हैं।
उम्मीदवारों के नाम तय होने के बावजूद भाजपा और कांग्रेस की ओर से पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह टिकट नहीं मिलने वाले दावेदारों की संभावित प्रतिक्रिया मानी जा रही है। पार्टी नेतृत्व को आशंका है कि सूची सामने आते ही कई असंतुष्ट दावेदार निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में टिकट से वंचित नेताओं के दूसरी पार्टी का रुख करने या अपने समर्थकों के साथ विरोध करने की संभावना भी पार्टी के लिए चिंता का विषय है।
इसी कारण कई जगह संभावित उम्मीदवारों को पहले व्यक्तिगत रूप से टिकट की जानकारी दी जा रही है। इससे उन्हें नामांकन की तैयारी के लिए समय मिल जाता है और पार्टी को सूची सार्वजनिक करने से पहले नाराज दावेदारों को मनाने का अवसर भी मिलता है। नामांकन की समयसीमा नजदीक होने के कारण दोनों दलों के लिए यह रणनीति और महत्वपूर्ण हो गई है।
राजधानी जयपुर में टिकट वितरण को लेकर दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। परिसीमन के बाद 150 पुनर्गठित वार्डों में राजनीतिक और सामाजिक समीकरण बदले हैं। कई पुराने वार्डों की सीमाएं बदलने से कुछ उम्मीदवारों का प्रभाव क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है। भाजपा को जयपुर के लिए बड़ी संख्या में आवेदन मिले हैं और कई वार्डों में टिकट के लिए एक से ज्यादा मजबूत दावेदार होने के कारण पार्टी को उम्मीदवार चयन में काफी मशक्कत करनी पड़ी है। कांग्रेस के सामने भी ऐसी ही स्थिति रही है। दोनों दलों को स्थानीय नेताओं के प्रभाव, सामाजिक समीकरण और जमीनी संगठन के बीच संतुलन बनाना पड़ा है।
टिकट को लेकर बढ़ी प्रतिस्पर्धा का असर पार्टी कार्यकर्ताओं की गतिविधियों में भी दिखाई दे रहा है। कई दावेदारों ने संभावित टिकट की उम्मीद में अपने स्तर पर जनसंपर्क और चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं। कुछ क्षेत्रों में उम्मीदवारों ने टिकट की आधिकारिक घोषणा से पहले ही चुनावी रणनीति बनानी शुरू कर दी है, क्योंकि नामांकन के लिए समय बेहद सीमित है।
निकाय चुनाव में किसी एक वार्ड से कई दावेदारों का होना सामान्य है, लेकिन टिकट केवल एक उम्मीदवार को दिया जा सकता है। यही स्थिति पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती है। मजबूत दावेदार यदि टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ता है तो वह पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के वोटों में बड़ी सेंध लगा सकता है। स्थानीय निकाय चुनावों में कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बहुत कम रहता है। ऐसे में एक मजबूत बागी उम्मीदवार पूरे चुनावी समीकरण को बदल सकता है।
भाजपा और कांग्रेस दोनों इस खतरे को समझते हुए टिकट की घोषणा से पहले ही डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं के जरिए नाराज दावेदारों से बातचीत, उन्हें संगठन में भविष्य की भूमिका का भरोसा देना और स्थानीय स्तर पर उनके समर्थकों को साथ बनाए रखना इस रणनीति का हिस्सा हो सकता है। पार्टी नेतृत्व के लिए यह जरूरी होगा कि टिकट नहीं मिलने वाले नेताओं को पूरी तरह अलग-थलग होने से रोका जाए।
उम्मीदवार चयन में दोनों दलों के सामने पुराने कार्यकर्ताओं और नए चेहरों के बीच संतुलन का सवाल भी है। पार्टी के पुराने कार्यकर्ता लंबे समय से संगठन के लिए काम करने के आधार पर टिकट की उम्मीद करते हैं। दूसरी ओर, कुछ वार्डों में ऐसे नए दावेदार भी मजबूत स्थिति में हैं जिनकी स्थानीय स्तर पर अच्छी पकड़ है। किसी नए चेहरे को टिकट देने पर पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा हो सकती है, जबकि केवल पुराने चेहरों पर भरोसा करने से पार्टी को कुछ वार्डों में मजबूत स्थानीय उम्मीदवार खोने का खतरा रहता है।
परिसीमन ने टिकट वितरण को और जटिल बनाया है। वार्डों की सीमाओं में बदलाव के कारण कई क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बदले हैं। ऐसे में पिछले चुनावों में किसी उम्मीदवार के प्रदर्शन को सीधे मौजूदा वार्ड की स्थिति से जोड़ना आसान नहीं है। पार्टी नेतृत्व को यह देखना पड़ रहा है कि वर्तमान वार्ड में किस उम्मीदवार की पकड़ मजबूत है, कौन स्थानीय मुद्दों को बेहतर तरीके से उठा सकता है और किसके पास कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की क्षमता है।
निकाय चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जमीनी संगठन की ताकत परखने का बड़ा अवसर हैं। भाजपा के सामने सत्ता में होने के बावजूद शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के लिए यह स्थानीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने और भाजपा को कड़ी चुनौती देने का मौका है। स्थानीय चुनावों में पार्टी के चुनाव चिह्न के साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, वार्ड में उसकी सक्रियता और मतदाताओं के साथ सीधा संपर्क भी नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है।
फिलहाल दोनों प्रमुख दलों ने अपने उम्मीदवारों का चयन कर लिया है, लेकिन अधिकृत सूची सामने आने का इंतजार है। सूची जारी होते ही यह स्पष्ट होगा कि किन दावेदारों को पार्टी ने मौका दिया और किन नेताओं को टिकट नहीं मिल पाया। इसके बाद सबसे अहम होगा कि टिकट से वंचित दावेदार क्या रुख अपनाते हैं।
यदि भाजपा और कांग्रेस असंतुष्ट नेताओं को मनाने में सफल रहती हैं तो चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से दोनों दलों के बीच रह सकता है। लेकिन बड़े पैमाने पर बगावत या निर्दलीय उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की स्थिति में कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है। इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ने की संभावना रहेगी।