जयपुर। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के लिए टिकट बंटने के साथ ही दोनों प्रमुख दलों बीजेपी और कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कई वार्डों में नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट मिलने से परिवारवाद के आरोप लग रहे हैं, वहीं टिकट कटने से नाराज कुछ पार्टी पदाधिकारी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतर गए हैं। कई जगह बाहरी प्रत्याशियों को टिकट दिए जाने को लेकर भी कार्यकर्ताओं ने विरोध जताया है। ऐसे में निकाय चुनाव अब सिर्फ वार्ड जीतने की लड़ाई नहीं रह गया, बल्कि नेताओं के प्रभाव और संगठन में उनकी पकड़ की भी परीक्षा बनता दिख रहा है।
बारां जिले की अटरू नगरपालिका में शिक्षा एवं पंचायतीराज मंत्री मदन दिलावर के छोटे भाई कृष्ण मुरारी दिलावर को बीजेपी ने वार्ड 5 से प्रत्याशी बनाया है। इसी तरह पूर्व विधायक रामपाल मेघवाल के बेटे कुलदीप चंद्रसेन ने भी बीजेपी के टिकट पर वार्ड 15 से नामांकन दाखिल किया है। इसी वार्ड में कांग्रेस के पूर्व विधायक पानाचंद मेघवाल के बड़े भाई बिशनलाल मेघवाल ने भी टिकट की दावेदारी की थी, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया और राकेश मेघवाल को मैदान में उतारा है।
डूंगरपुर में बीजेपी की सूची जारी होते ही कुछ कार्यकर्ताओं ने बाहरी प्रत्याशियों को टिकट देने का विरोध शुरू कर दिया। पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ताओं की नाराजगी देखने को मिली और पदाधिकारियों को असंतुष्ट दावेदारों को मनाने में जुटना पड़ा। कोटा नगर निगम में कांग्रेस ने नामांकन के अंतिम समय में सिंबल जारी किए, जिससे बगावत कर निर्दलीय नामांकन की गुंजाइश कम हुई, हालांकि प्रत्याशियों की घोषणा के बाद वहां भी कुछ वार्डों में विरोध की स्थिति बनी हुई है।
अलवर में भी कई टिकट नेताओं के परिवारों तक पहुंचने से सियासी चर्चा तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे अजय अग्रवाल की पत्नी सुमनलता को बीजेपी ने वार्ड 7 से टिकट दिया है। कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष योगेश मिश्रा की पत्नी कमलेश को वार्ड 39 से मैदान में उतारा गया है। वहीं वार्ड 20 में निवर्तमान मेयर की पुत्रवधू बीना गुप्ता और वार्ड 36 में विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी रहे नीलेश खंडेलवाल की पुत्रवधू अपूर्वा शर्मा को बीजेपी ने टिकट दिया है।
टिकट वितरण का असर पार्टी संगठन पर भी दिखाई दे रहा है। अलवर में बीजेपी के कुछ पदाधिकारियों ने टिकट नहीं मिलने पर इस्तीफा देकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का रास्ता चुना। श्रीकेशव मंडल के अध्यक्ष महेश निहालवानी और उनकी कार्यकारिणी को मनाने की कोशिश हुई, जबकि पार्टी प्रवक्ता नरेश धानावत ने इस्तीफा देकर निर्दलीय नामांकन किया। श्री माधव मंडल में घनश्याम दत्त गुप्ता ने भी पद से इस्तीफा देकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भरा।
कुछ क्षेत्रों में टिकट वितरण ने पारिवारिक मुकाबले का रंग भी ले लिया है। सीकर नगर परिषद में कांग्रेस ने पूर्व सभापति जीवण खां और उनकी पत्नी खतीजा बानो को अलग-अलग वार्डों से टिकट दिया है। पूर्व उपसभापति अशोक चौधरी की पुत्रवधू को भी पार्टी ने मैदान में उतारा है। बीजेपी ने पूर्व विधायक रतन जलधारी के पोते यश जलधारी को टिकट दिया है। फतेहपुर में भी बीजेपी ने एक ही परिवार से जुड़े लोगों को अलग-अलग वार्डों में मौका दिया है।
खंडेला में बीजेपी ने वार्ड 5 से विकास बडगुर्जर और वार्ड 6 से उनकी पत्नी बिमला को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने वार्ड 13 से भूराराम और वार्ड 9 से उनके बेटे सुभाष को टिकट दिया है। लक्ष्मणगढ़ में बीजेपी की ओर से सरोज देवी और उनकी पुत्रवधू शीतल जोशी को टिकट मिला है, जबकि कांग्रेस ने परमेश्वरी देवी और उनके बेटे संजीव को अलग-अलग वार्डों से उतारा है।
पोकरण में तो चुनावी मुकाबला एक ही परिवार के भीतर पहुंच गया है। यहां कांग्रेस की ओर से गोपाल रंगा की पत्नी कल्पना और उनकी सास पुष्पा रंगा ने अलग-अलग वार्डों से नामांकन भरा है। वहीं वार्ड 10 में कांग्रेस के शांतिलाल व्यास के सामने बीजेपी से उनके भतीजे हुकमीचंद मैदान में हैं। इस तरह कई जगह निकाय चुनाव में पारिवारिक रिश्ते और राजनीतिक मुकाबला एक साथ दिखाई दे रहे हैं।
इन सबके बीच बीजेपी ने जयपुर सहित कई शहरों में मुस्लिम समाज के स्थानीय चेहरों को भी टिकट देकर सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश की है। पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक, जयपुर शहर में बीजेपी ने आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। इसे पार्टी की व्यापक सामाजिक पहुंच बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में राजस्थान में बीजेपी ने किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया था।
वहीं कुछ नगर निकायों में बीजेपी को टिकट वितरण के बाद संगठनात्मक चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है। भरतपुर में शहर मंडल अध्यक्ष चंद्रवीर सिंह जघीना टिकट नहीं मिलने से नाराज हैं और उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की है। दूसरी ओर सागवाड़ा और डूंगरपुर में भारत आदिवासी पार्टी ने भी निकाय चुनाव में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए कई वार्डों में उम्मीदवार उतारे हैं।
निकाय चुनाव में टिकट बंटवारे की तस्वीर से साफ है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों के सामने बागियों और असंतुष्ट दावेदारों को संभालना बड़ी चुनौती है। परिवार के सदस्यों को मिले टिकट, बाहरी प्रत्याशियों को लेकर नाराजगी और निर्दलीय उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। अब असली परीक्षा मतदान के दिन होगी कि पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार अपनी पकड़ बनाए रख पाते हैं या बगावत और स्थानीय समीकरण चुनावी नतीजों को बदल देते हैं।