New Delhi : रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर अमेरिका की ओर से 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की आशंका के बीच नई दिल्ली ने अपना रुख साफ कर दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा और अपने व्यापार एवं आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की ऊर्जा खरीद नीति बदलती वैश्विक परिस्थितियों, बाजार की स्थिति और देश की जरूरतों के आधार पर तय होती रहेगी।
यह बयान अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की ओर से Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 262-159 मतों से मंजूरी दिए जाने के एक दिन बाद आया है। अमेरिकी सीनेट इस विधेयक को अगस्त में 86-11 के मत से पारित कर चुकी थी। अब यह कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है। इसके तहत अमेरिकी प्रशासन को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार इसके संभावित दायरे में हैं।
हालांकि, यहां एक बात साफ समझना जरूरी है—भारत पर अभी 100 फीसदी टैरिफ लागू नहीं हुआ है। कांग्रेस से कानून पारित होने का मतलब यह है कि राष्ट्रपति को शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है; वास्तविक टैरिफ कितना होगा, किन भारतीय उत्पादों पर लागू होगा और इसे कब से लागू किया जाएगा, ये फैसले आगे अमेरिकी प्रशासन को लेने हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सरकार अमेरिकी कानून से जुड़े घटनाक्रम पर नजर रख रही है। मंत्रालय के मुताबिक, इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा हुई है और भारत ने इस कदम के संभावित असर को लेकर अपनी चिंताएं पहले ही सामने रख दी थीं। भारत ने खास तौर पर कहा है कि इसका असर सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
भारत का कहना है कि उसकी पहली प्राथमिकता 1.4 अरब लोगों के लिए भरोसेमंद और किफायती ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत ऊर्जा स्रोतों में विविधता बनाए रखेगा और खरीद के फैसले बदलती बाजार परिस्थितियों के आधार पर लिए जाएंगे। यानी नई दिल्ली फिलहाल किसी एक सप्लायर या किसी एक बाजार पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने की नीति पर कायम है।
अमेरिकी कदम का असर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बातचीत चल रही है और ऐसे समय में रूसी तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त अमेरिकी शुल्क की संभावना नई चुनौती बनकर सामने आई है। भारत ने इस पूरे घटनाक्रम के संभावित द्विपक्षीय प्रभावों को लेकर अमेरिका को पहले ही अपनी स्थिति बता दी है।
रूस से तेल खरीद का मुद्दा यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत और पश्चिमी देशों के बीच लगातार चर्चा में रहा है। भारत ने कई मौकों पर कहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का आधार देश की जरूरत, उपलब्धता और बाजार की परिस्थितियां हैं। रूस से मिलने वाले कच्चे तेल ने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रिफाइनरों के लिए एक महत्वपूर्ण आपूर्ति स्रोत का रूप लिया है, जबकि भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है।
अब अमेरिका की ओर से कानून पारित होने के बाद अगला बड़ा कदम राष्ट्रपति ट्रंप के स्तर पर होगा। यदि कानून पर हस्ताक्षर होते हैं और प्रशासन शुल्क लगाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाता है, तभी भारत पर संभावित टैरिफ की वास्तविक दर, उत्पादों का दायरा और लागू होने की समयसीमा स्पष्ट होगी। फिलहाल भारत ने संकेत दे दिया है कि वह घटनाक्रम पर नजर रखेगा और जरूरत पड़ने पर अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए कदम उठाएगा।
भारत सरकार ने यह भी कहा है कि वह इस मामले से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी। ऐसे में आने वाले दिनों में सबसे अहम सवाल यह रहेगा कि अमेरिकी प्रशासन इस नए अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है और उसका भारतीय निर्यात तथा दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता पर कितना असर पड़ता है।