New Delhi : E20 पेट्रोल नीति को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सड़क पर पहुंचने वाली है। राजनीति विश्लेषक तहसीन पूनावाला के आह्वान पर 20 सितंबर को सुबह 11 बजे नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया गया है। आयोजकों की ओर से लोगों से ‘टीम भारत’ के बैनर तले प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की गई है। E20 यानी पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण को लेकर पिछले कुछ महीनों से वाहन मालिकों, विपक्षी नेताओं और विभिन्न समूहों की ओर से सवाल उठते रहे हैं। इससे पहले जुलाई में भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर E20 के खिलाफ प्रदर्शन किया गया था।
20 सितंबर को होने वाले प्रस्तावित प्रदर्शन में E20 नीति के आर्थिक असर, पुराने वाहनों की अनुकूलता और उपभोक्ताओं के लिए ईंधन के विकल्प जैसे मुद्दे उठाए जाने की तैयारी है। प्रदर्शन के आह्वान में आयोजकों ने सरकार की E20 नीति से जुड़े आर्थिक आंकड़ों और इसके प्रभावों को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि सरकार E20 को विदेशी मुद्रा बचत और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने से जोड़ती है, ऐसे में इस नीति से जुड़े आर्थिक लाभ और प्रभाव के आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने चाहिए, ताकि विशेषज्ञ और आम उपभोक्ता उनका स्वतंत्र रूप से आकलन कर सकें।
प्रदर्शनकारियों की ओर से एथेनॉल डिस्टिलरी और निजी चीनी मिलों के स्वामित्व तथा कथित राजनीतिक संपर्कों को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में इन्हें आयोजकों की ओर से लगाए गए आरोपों और राजनीतिक दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
प्रस्तावित प्रदर्शन में चार प्रमुख मांगें सामने रखी गई हैं। इनमें सबसे पहली मांग पुराने वाहनों के लिए E10 पेट्रोल की उपलब्धता से जुड़ी है। आयोजकों का कहना है कि देशभर के पेट्रोल पंपों पर पुराने इंजन वाले वाहनों के लिए E10 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि सभी पुराने वाहन E20 ईंधन के लिए समान तकनीकी मानकों के आधार पर डिजाइन नहीं किए गए हैं और ऐसे वाहनों के मालिकों के पास वैकल्पिक ईंधन का विकल्प होना चाहिए।
E20 की वाहन अनुकूलता का मुद्दा पहले भी चर्चा में रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार की ओर से उपलब्ध वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा गया है कि E20 के इस्तेमाल से पुराने वाहनों में व्यापक स्तर पर इंजन क्षति या असामान्य घिसावट का प्रमाण नहीं मिला है। सरकार का कहना है कि E20 को चरणबद्ध तरीके से लागू करने से पहले वाहन निर्माताओं और तकनीकी संस्थानों के स्तर पर परीक्षण किए गए हैं।
प्रदर्शनकारियों की दूसरी प्रमुख मांग बिना एथेनॉल मिश्रण वाले E0 पेट्रोल को अधिकतम 90 रुपये प्रति लीटर की दर से उपलब्ध कराने की है। हालांकि, यह पूरी तरह प्रदर्शनकारियों की मांग है और इसे सरकार की घोषित मूल्य नीति नहीं माना जा सकता। केंद्र सरकार पहले ही E0 या E10 की ओर वापस लौटने का कोई प्रस्ताव नहीं होने की बात कह चुकी है। ऐसे में E0 पेट्रोल की उपलब्धता और कीमत को लेकर प्रदर्शनकारियों की मांग फिलहाल सरकार की नीति से अलग दिखाई देती है।
तीसरी प्रमुख मांग E20 से जुड़े आंकड़ों को सार्वजनिक करने की है। प्रदर्शनकारी E20 के परीक्षण, सरकारी अध्ययनों, टेस्ट रिपोर्ट और इसके प्रभाव के आकलन से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक किए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे विशेषज्ञों, वाहन मालिकों और उपभोक्ताओं को नीति के फायदे और संभावित नुकसान को समझने में मदद मिलेगी।
सरकार का पक्ष इस मामले में अलग है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, E20 को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है और इसके लिए वाहन निर्माताओं, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM), तेल विपणन कंपनियों और अन्य तकनीकी संस्थानों के साथ परीक्षण और परामर्श किए गए हैं। सरकार ने E20 कार्यक्रम से 1.97 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बचत होने का भी दावा किया है।
प्रस्तावित प्रदर्शन की मांगों में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और हरदीप सिंह पुरी को पद से हटाने की मांग भी शामिल है। आयोजकों का आरोप है कि E20 नीति को आगे बढ़ाने में दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, यह मांग प्रदर्शनकारियों के राजनीतिक रुख का हिस्सा है और इससे जुड़े आरोपों को तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए स्वतंत्र प्रमाण की जरूरत होगी।
E20 को लेकर सरकार और विरोध करने वाले समूहों के तर्कों में मूल अंतर नीति के उद्देश्य और उसके प्रभाव को लेकर है। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने और उत्सर्जन कम करने की दिशा में उठाया गया कदम बताती है। जुलाई में सरकार की ओर से कहा गया था कि E20 कार्यक्रम के जरिए करीब 316 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात का विकल्प तैयार हुआ और किसानों को 1.66 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया।
दूसरी ओर, E20 का विरोध करने वाले समूह पुराने वाहनों की ईंधन दक्षता, उपभोक्ताओं के पास वैकल्पिक ईंधन की उपलब्धता और E20 की कीमत को लेकर सवाल उठा रहे हैं। जुलाई में हुए प्रदर्शनों के दौरान कुछ वाहन मालिकों की ओर से माइलेज में कमी और वाहन संबंधी समस्याओं की शिकायतें भी सामने आई थीं। हालांकि, व्यक्तिगत शिकायतों और व्यापक तकनीकी निष्कर्षों के बीच अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है और किसी एक वाहन के अनुभव को पूरे वाहन बाजार पर लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार फिलहाल E20 नीति को वापस लेने के पक्ष में नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने जुलाई में स्पष्ट किया था कि E0 या E10 पेट्रोल पर वापस लौटने का कोई प्रस्ताव नहीं है। सरकार ने यह भी कहा है कि भविष्य में 20 फीसदी से अधिक एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर कोई फैसला विस्तृत वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन तथा संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद ही लिया जाएगा।
इसी बीच सितंबर में प्रधानमंत्री के सलाहकार तरुण कपूर ने भी E20 को लेकर कहा कि मौजूदा वाहनों के लिए 20 फीसदी से आगे एथेनॉल मिश्रण की संभावना सीमित है और ज्यादा एथेनॉल मिश्रण के लिए फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि आगे की नीति में वाहन तकनीक और ईंधन के बीच अनुकूलता को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब 20 सितंबर को प्रस्तावित जंतर-मंतर प्रदर्शन पर नजर रहेगी। प्रदर्शनकारी जहां E10 की उपलब्धता, E0 पेट्रोल के विकल्प, E20 से जुड़े आंकड़ों की पारदर्शिता और नीति की समीक्षा जैसी मांगों को उठा रहे हैं, वहीं सरकार E20 को ऊर्जा सुरक्षा और वैज्ञानिक-तकनीकी परीक्षणों पर आधारित नीति के रूप में देख रही है।
ऐसे में 20 सितंबर का प्रदर्शन E20 को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला सकता है। यह प्रदर्शन केवल ईंधन नीति के विरोध तक सीमित रहता है या इसके जरिए सरकार पर व्यापक राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश होती है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल E20 को लेकर सरकार और विरोध करने वाले समूहों के बीच सबसे बड़ा मतभेद यही है कि एक पक्ष इसे ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा की दिशा में जरूरी कदम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उपभोक्ता विकल्प, पुराने वाहनों और नीति की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहा है।