Jaipur : राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के चुनाव नतीजों ने कांग्रेस के सामने सिर्फ वार्डों का गणित नहीं रखा है, बल्कि उसके नए जिला संगठन की जमीनी ताकत को परखने का मौका भी दिया है। राज्य में भाजपा 148 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि कांग्रेस 104 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही। कई जगह निर्दलीयों ने भी मजबूत प्रदर्शन किया, जिससे बोर्ड गठन का गणित अलग-अलग निकायों में बदल गया। ऐसे में कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के तहत जिम्मेदारी संभाल रहे नए जिलाध्यक्षों के सामने अब संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और स्थानीय चुनावी प्रबंधन को मजबूत करने की चुनौती है।
इन चुनावों से पहले कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के जरिए जिला स्तर पर नए नेतृत्व को जिम्मेदारी दी थी। अभियान का उद्देश्य जिला संगठन को सक्रिय करने के साथ वार्ड और बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क मजबूत करना था। अब निकाय चुनाव के परिणाम इस नए ढांचे के लिए शुरुआती राजनीतिक परीक्षा की तरह देखे जा रहे हैं। हालांकि किसी जिलाध्यक्ष के कामकाज को केवल चुनावी परिणाम से सफल या असफल ठहराना उचित नहीं होगा, क्योंकि स्थानीय चुनावों में उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण, परिसीमन और निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका भी परिणामों को प्रभावित करती है।
पश्चिमी राजस्थान का बालोतरा इस पूरे चुनावी गणित में कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। जिले की सातों नगरीय निकायों के कुल 185 वार्डों में भाजपा ने 105, कांग्रेस ने 62 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 18 सीटें जीतीं। भाजपा सभी सातों निकायों में बहुमत हासिल करने में सफल रही। बालोतरा नगर परिषद के 55 वार्डों में भाजपा ने 29, कांग्रेस ने 23 और निर्दलीयों ने तीन सीटें जीतीं।
जैसलमेर में भी भाजपा ने नगर परिषद की 45 सीटों में से 25 जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर रही और चार सीटें निर्दलीय या बागी उम्मीदवारों के खाते में गईं। इसके उलट पोकरण में कांग्रेस 12 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही, भाजपा को 11 और निर्दलीयों को दो सीटें मिलीं। बाड़मेर जिले के चौहटन में भाजपा ने 20 में से 11 वार्ड जीते, जबकि नौ सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे और कांग्रेस एक भी वार्ड नहीं जीत सकी। इन नतीजों से साफ है कि एक ही क्षेत्र के भीतर भी निकायवार राजनीतिक समीकरण अलग रहे।
राजधानी जयपुर की तस्वीर भी पूरी तरह एकतरफा नहीं रही। पुनर्मतदान के बाद नगर निगम के 150 वार्डों में भाजपा 78 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही, जबकि कांग्रेस 57 पर पहुंची। पुनर्मतदान वाले चार वार्ड कांग्रेस ने जीते थे। यानी जहां एक तरफ भाजपा ने निगम में बहुमत हासिल किया, वहीं कांग्रेस ने दोबारा मतदान वाले सभी चार वार्ड जीतकर स्थानीय स्तर पर अपनी मौजूदगी के कुछ संकेत भी दिए।
राज्य स्तर पर देखें तो चुनाव परिणामों में भाजपा को बढ़त मिली, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। घोषित 10,244 वार्डों में भाजपा ने 4,179, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीयों ने 2,273 सीटें जीतीं। कई निकायों में यही निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन के समीकरण में निर्णायक भूमिका में हैं। इससे कांग्रेस के लिए चुनौती सिर्फ भाजपा से मुकाबले की नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर पार्टी संगठन और उम्मीदवारों के बीच समन्वय की भी है।
इसी बीच कांग्रेस के नए जिलाध्यक्षों की कार्यशैली पर पहले से ही पार्टी हाईकमान की नजर रही है। मार्च में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक संगठन सृजन अभियान के तहत नियुक्त जिला अध्यक्षों की साप्ताहिक और मासिक समीक्षा ऐप के जरिए की जा रही थी और प्रदर्शन के आधार पर रेटिंग भी दी जा रही थी। उस रिपोर्ट में 50 जिलाध्यक्षों में सिर्फ चार को पांच स्टार रेटिंग मिलने की बात कही गई थी।
अब निकाय चुनाव के बाद जिलाध्यक्षों के सामने सिर्फ संगठनात्मक बैठकें करने की नहीं, बल्कि चुनावी स्तर पर उसका असर दिखाने की चुनौती होगी। टिकट वितरण में स्थानीय नेताओं का तालमेल, बागी उम्मीदवारों को संभालना, बूथ कमेटियों की सक्रियता, कार्यकर्ताओं को चुनाव के दौरान मैदान में बनाए रखना और निर्दलीय उम्मीदवारों के कारण बनने वाले स्थानीय समीकरणों को समझना—ये सभी मुद्दे अगले चरण की समीक्षा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इन चुनावों का एक और पहलू परिसीमन से जुड़ा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने चुनावी प्रदर्शन पर परिसीमन को जिम्मेदार ठहराया है। दूसरी ओर, चुनावी विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि कुल वोटों में दोनों प्रमुख दलों के बीच अंतर सीमित रहने के बावजूद वार्ड जीतने में बड़ा अंतर रहा। परिसीमन के प्रभाव को लेकर कांग्रेस का यह तर्क एक राजनीतिक दावा है; इसे संगठनात्मक प्रदर्शन के आकलन से अलग रखकर देखना जरूरी है।
अब कांग्रेस के नए जिला संगठन के सामने अगली चुनौती निकाय चुनाव के आंकड़ों को केवल समीक्षा रिपोर्ट में दर्ज करने की नहीं, बल्कि उसे संगठनात्मक सुधार में बदलने की है। कार्यकारिणियों का गठन, बूथ स्तर पर सक्रियता, स्थानीय गुटों के बीच समन्वय, मजबूत उम्मीदवारों की पहचान और आगामी पंचायत चुनावों की तैयारी आने वाले महीनों में जिलाध्यक्षों की भूमिका को परखने वाले प्रमुख मुद्दे हो सकते हैं। निकाय चुनाव ने कांग्रेस को एक ऐसा राजनीतिक फीडबैक जरूर दिया है, जिसमें वार्डों की संख्या के साथ-साथ यह सवाल भी शामिल है कि नया जिला संगठन जमीन पर कितना सक्रिय और चुनाव के समय कितना प्रभावी साबित होता है।