नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में हो रहे 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में शनिवार को बड़ी कूटनीतिक सफलता सामने आई। BRICS सदस्य देशों के बीच नई दिल्ली घोषणा-पत्र को लेकर आम सहमति बन गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के दौरान कहा कि प्रस्तावित घोषणा-पत्र पर किसी भी सदस्य देश ने आपत्ति नहीं जताई। ऐसे समय में जब BRICS के भीतर पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के अलग-अलग हितों के साथ वैश्विक व्यापार और प्रतिबंधों जैसे मुद्दों को लेकर मतभेद की संभावना जताई जा रही थी, सभी सदस्य देशों का साझा घोषणा पर सहमत होना भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
घोषणा-पत्र को अंतिम रूप देने के लिए BRICS सदस्य देशों के बीच देर रात तक गहन बातचीत चली। रिपोर्टों के मुताबिक, वार्ता शनिवार तड़के करीब 4 बजे तक जारी रही। इसके बाद संयुक्त घोषणा-पत्र के मसौदे पर सदस्य देशों के बीच सहमति बन सकी। लंबी बातचीत के बाद बनी यह सहमति इस बात का संकेत भी मानी जा रही है कि अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं के बावजूद सदस्य देश कुछ साझा मुद्दों पर एक साथ आगे बढ़ने को तैयार हैं।
भारत के लिए यह सहमति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस साल BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है। संगठन के विस्तार के बाद इसमें शामिल देशों के राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हितों में विविधता और बढ़ी है। ऐसे में सभी सदस्य देशों को साथ लेकर साझा दस्तावेज पर सहमति बनाना आसान नहीं था। भारत की अध्यक्षता में घोषणा-पत्र को अंतिम रूप दिए जाने को इसी कूटनीतिक संतुलन के संदर्भ में देखा जा रहा है।
नई दिल्ली घोषणा-पत्र में BRICS देशों ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संघर्ष पर गहरी चिंता जताई। सदस्य देशों ने अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की, जिनसे क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। घोषणा में अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए संवाद, परामर्श और कूटनीति के रास्ते को प्राथमिकता देने की प्रतिबद्धता भी दोहराई गई।
घोषणा-पत्र में पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर BRICS का रुख ऐसे समय में सामने आया है, जब क्षेत्र में जारी संघर्ष का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं है। इससे ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ने की आशंकाएं बनी हुई हैं। ऐसे में BRICS देशों की ओर से संयम और कूटनीतिक समाधान पर जोर देना व्यापक वैश्विक स्थिरता के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है।
BRICS में अब ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों शामिल हैं। पश्चिम एशिया के मौजूदा घटनाक्रम को लेकर दोनों देशों के हित और रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। ऐसे में संयुक्त घोषणा-पत्र पर सभी सदस्यों की सहमति हासिल करना एक चुनौती माना जा रहा था। भारत ने इसी परिस्थिति में अलग-अलग रुख रखने वाले सदस्य देशों के बीच संतुलन बनाने और साझा बिंदुओं पर सहमति कायम करने की कोशिश की।
घोषणा-पत्र में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों से वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई। BRICS देशों ने ऐसे कदमों के खिलाफ अपना रुख रखा, जिनसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है। यह मुद्दा ऐसे समय में खास महत्व रखता है, जब दुनिया के कई हिस्सों में टैरिफ, व्यापारिक प्रतिबंध और सप्लाई चेन को लेकर तनाव बना हुआ है।
BRICS देशों का यह रुख वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच सामने आया है। सदस्य देशों ने व्यापार और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। भारत लगातार BRICS को आर्थिक सहयोग, निवेश और व्यापार के लिए अधिक व्यावहारिक मंच के रूप में आगे बढ़ाने की बात करता रहा है। ऐसे में घोषणा-पत्र में व्यापार से जुड़े मुद्दों का शामिल होना भारत की प्राथमिकताओं से भी जुड़ा माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS को सहमति, समानता और सहयोग के आधार पर आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने संगठन को किसी एक देश या गुट के खिलाफ मंच के तौर पर पेश करने के बजाय व्यावहारिक सहयोग का मंच बनाने की बात कही। भारत का जोर यह रहा है कि BRICS के सदस्य देश अपने मतभेदों के बावजूद उन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाएं, जहां साझा हित मौजूद हैं।
पीएम मोदी ने वैश्विक शासन व्यवस्था में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ को केवल मौजूदा नियमों का पालन करने वाला पक्ष नहीं होना चाहिए, बल्कि वैश्विक नियमों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने इसके लिए ‘rule-shaper’ की भूमिका पर जोर दिया। भारत लंबे समय से वैश्विक संस्थानों में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व की मांग उठाता रहा है।
12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में हो रहा यह BRICS सम्मेलन भारत की विदेश नीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। संगठन में अलग-अलग राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित रखने वाले देश शामिल हैं। ऐसे में साझा एजेंडे पर सहमति बनाना भारत की अध्यक्षता के लिए एक बड़ी परीक्षा थी। घोषणा-पत्र पर सहमति को इसी पृष्ठभूमि में भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।
इससे पहले BRICS के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भी संयुक्त बयान को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी। ऐसे में नेताओं के स्तर पर लंबी बातचीत के बाद घोषणा-पत्र पर सहमति बनना खास महत्व रखता है। इससे भारत की अध्यक्षता के दौरान विभिन्न सदस्य देशों के बीच संवाद और समन्वय बनाए रखने की कोशिशों को भी बल मिला है।
हालांकि, घोषणा-पत्र पर सहमति बनने का मतलब यह नहीं है कि BRICS के सदस्य देशों के बीच सभी रणनीतिक और भू-राजनीतिक मतभेद खत्म हो गए हैं। समूह में शामिल देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में आगे की चुनौती यह होगी कि साझा घोषणा में तय किए गए बिंदुओं को किस तरह व्यावहारिक सहयोग में बदला जाता है और अलग-अलग मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद समूह की एकजुटता कैसे बनाए रखी जाती है।
भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन से नई दिल्ली की कोशिश यही रही है कि BRICS को वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने के साथ-साथ आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग के प्रभावी मंच के रूप में आगे बढ़ाया जाए। घोषणा-पत्र पर आम सहमति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।