Jaipur : राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद अब असली सियासी परीक्षा मेयर की कुर्सी पर है। राज्य के 10 नगर निगमों में नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगी है। कहीं BJP के पास बहुमत का रास्ता साफ है तो कहीं कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी आंकड़े से दूर खड़ी है। कई निगमों में दोनों प्रमुख दलों के बीच मुकाबला इतना करीबी है कि निर्दलीय पार्षदों का एक-एक वोट मेयर की कुर्सी का फैसला बदल सकता है। 10 नगर निगमों में से कई जगह स्पष्ट बहुमत नहीं होने के कारण चुनावी मुकाबला अब वार्ड जीतने से आगे बढ़कर समर्थन जुटाने की राजनीति में पहुंच गया है।
अजमेर में कांग्रेस 37 पार्षदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि BJP के 32 पार्षद हैं। 80 सदस्यीय निगम में बहुमत के लिए 41 वोट चाहिए। यानी कांग्रेस को बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए चार और BJP को नौ समर्थन की जरूरत है। कांग्रेस ने पांच निर्दलीय पार्षदों के समर्थन का दावा भी किया है और इसके पक्ष में निर्दलीयों के साथ तस्वीरें जारी की गई हैं। हालांकि दावा और अंतिम वोट में अभी फासला है, इसलिए मेयर चुनाव के दिन ही पूरा गणित साफ होगा।
जोधपुर में तो मुकाबला री-पोलिंग तक पहुंच गया था। शुरुआती नतीजों में BJP और कांग्रेस 44-44 पर अटकी थीं और वार्ड 50 का परिणाम EVM में तकनीकी गड़बड़ी के कारण रोक दिया गया था। बुधवार को हुए री-पोल के बाद BJP के हेमाराम ने वार्ड 50 जीत लिया और अब निगम में BJP के 45, कांग्रेस के 44, निर्दलीयों के 10 और RLP का एक पार्षद है। यानी BJP एक सीट की बढ़त पर जरूर पहुंची है, लेकिन 100 सदस्यीय निगम में बहुमत के लिए 51 वोट चाहिए। लिहाजा यहां भी मेयर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।
पाली में कांग्रेस 29 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, जबकि BJP को 21 और निर्दलीयों को 15 सीटें मिली हैं। 65 सदस्यीय निगम में बहुमत का आंकड़ा 33 है। ऐसे में कांग्रेस बहुमत से चार कदम दूर है, जबकि BJP को काफी ज्यादा समर्थन की जरूरत होगी। यहां 15 निर्दलीय पार्षदों के पास मेयर चुनाव का समीकरण प्रभावित करने की पर्याप्त ताकत है।
अलवर में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है। 65 सदस्यीय निगम में BJP के 28 और कांग्रेस के 23 पार्षद हैं। दोनों ही बहुमत के 33 के आंकड़े से नीचे हैं। BJP ने सुमन लता अग्रवाल और कांग्रेस ने कमलेश शर्मा को मेयर पद के लिए उम्मीदवार बनाया है। एक निर्दलीय उम्मीदवार रिंकल गर्ग ने भी नामांकन दाखिल किया है। ऐसे में मुकाबला केवल BJP-कांग्रेस के बीच नहीं रह गया है, बल्कि समर्थन जुटाने की कवायद भी साथ-साथ चल रही है।
खैरथल नगर परिषद में भी चुनावी गणित खासा दिलचस्प है। यहां कांग्रेस के 20, BJP के 8 और निर्दलीयों के 17 पार्षद हैं। 45 सदस्यीय परिषद में बहुमत के लिए 23 वोट चाहिए। इसी बीच कांग्रेस नेता विक्रम सिंह उर्फ विक्की चौधरी के BJP में शामिल होने और कुछ पार्षदों के साथ आने के दावों ने यहां के समीकरण को और उलझा दिया है। हालांकि दावे अपनी जगह हैं, लेकिन अंतिम बोर्ड का गणित पार्षदों के वास्तविक समर्थन और चुनावी प्रक्रिया के दौरान ही स्पष्ट होगा।
भीलवाड़ा में मुकाबला और भी अलग तस्वीर पेश कर रहा है। यहां BJP की जसवंत कंवर और निर्दलीय संतोष कंवर मेयर पद की दौड़ में हैं, जबकि कांग्रेस की ओर से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरा। नामांकन की समयसीमा तक कांग्रेस के किसी पार्षद ने मेयर पद के लिए पर्चा दाखिल नहीं किया। ऐसे में भीलवाड़ा का मुकाबला सीधे BJP बनाम निर्दलीय हो गया है।
दूसरी तरफ जयपुर, जोधपुर, कोटा और सुकेत में EVM से जुड़ी तकनीकी गड़बड़ियों के कारण मेयर/सभापति चुनाव का कार्यक्रम बाकी निकायों से अलग हो गया है। इन चारों निकायों में री-पोलिंग 16 सितंबर को हुई और मतगणना 17 सितंबर को की गई। राज्य निर्वाचन आयोग ने इन निकायों के मेयर, डिप्टी मेयर तथा सभापति/उपसभापति चुनाव फिलहाल स्थगित किए हैं। आयोग की ओर से नई तारीख अभी घोषित नहीं हुई है; अधिकारियों ने 25 सितंबर या उसके बाद चुनाव होने की संभावना जताई थी।
यानी बाकी निकायों में 21 और 22 सितंबर को बोर्ड गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, जबकि इन चार निकायों को थोड़ा और इंतजार करना होगा। खास बात यह है कि री-पोलिंग के बाद सामने आए नतीजे कई जगह पहले बने समीकरण को भी बदल सकते हैं। जोधपुर इसका ताजा उदाहरण है, जहां 44-44 की बराबरी अब BJP के 45-44 की बढ़त में बदल चुकी है।
पूरे राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव के आंकड़े भी इस सियासी खींचतान की तस्वीर समझाते हैं। 309 शहरी निकायों में BJP ने 4,179 वार्ड जीते, कांग्रेस को 3,613 वार्डों में जीत मिली, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार 2,273 वार्डों में विजयी रहे। राज्य के 10 नगर निगमों में BJP को चार जगह स्पष्ट बहुमत मिला है, जबकि कई अन्य निगमों में बोर्ड गठन के लिए अतिरिक्त समर्थन की जरूरत है।
यही वजह है कि अब चुनावी मैदान में पोस्टर और प्रचार से ज्यादा महत्व बैठकों, संपर्कों और समर्थन के दावों का हो गया है। जिन जगहों पर किसी एक दल के पास बहुमत है, वहां तस्वीर अपेक्षाकृत सीधी है, लेकिन अजमेर, जोधपुर, पाली, अलवर जैसे निगमों में हर पार्षद की राजनीतिक कीमत बढ़ गई है। मतदाताओं ने वार्ड का फैसला सुना दिया, अब मेयर की कुर्सी का गणित पार्षदों के समर्थन से लिखा जाएगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सा दल अपने आंकड़े को बहुमत में बदल पाता है और कौन सा दावा सिर्फ सियासी बातचीत तक सीमित रह जाता है।